सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स, वीडियो पर हजारोंलाखों लाइक्स और कमेंट्स देखकर कई बार लोगों को लगता है अगर ये लोग चुनाव में उतरे तो जीत कहीं नहीं गई, लेकिन वोटों की गिनती होते ही पॉपुलरिटी के ये आंकड़े कई बार धराशायी हो जाते हैं. राजस्थान के जोधपुर में सरपंच का चुनाव लड़ने वाले ओमप्रकाश बिश्नोई इसका ताजा उदाहरण हैं.

सोशल मीडिया पर 21 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स होने के बावजूद उन्हें अपने ही गांव में सिर्फ 33 वोट मिले. लगभग 1,600 मतदाताओं वाली ग्राम पंचायत का ये रिजल्ट डिजिटल फेम और ग्राउंड सपोर्ट का अंतर दिखाता है.
वायरल होने और वोट पाने में कितना अंतर
ओमप्रकाश बिश्नोई अकेले ऐसे उदाहरण नहीं हैं. सोशल मीडिया के कई फेमस चेहरे चुनावी मैदान में उतरकर अपनी मिलियन फॉलोअर्स को वोटों में नहीं बदल पाए.
खेसारी लाल यादव भोजपुरी एक्टर और सिंगर खेसारी लाल यादव साल 2025 में बिहार की छपरा सीट से आरजेडी के टिकट पर चुनाव लड़े.लेकिन बीजेपी की छोटी कुमारी ने 86,845 वोट हासिल कर उन्हें 7,600 वोटों से हरा दिया.
जोस्लिन नंदिता चौधरी सोशल मीडिया पर फेमस स्टूडेंट लीडर जोस्लिन ने 2025 के दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में एनएसयूआई की ओर से प्रेसिडेंट का चुनाव लड़ा. उन्हें 12,645 वोट मिले, जबकि एबीवीपी के आर्यन मान 28,841 वोट लेकर अध्यक्ष बने.
एजाज खान बिग बॉस फेम एक्टर एजाज खान 2024 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मुंबई की वर्सोवा सीट से आजाद समाज पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़े. इंस्टाग्राम पर उनके करीब 56 लाख फॉलोअर्स थे, लेकिन उन्हें सिर्फ 155 वोट मिले. उनसे कहीं ज्यादा 1,298 वोट नोटा को मिले.
पवन सिंह भोजपुरी अभिनेता और गायक पवन सिंह ने 2024 में बिहार की काराकाट लोकसभा सीट से निर्दलीय चुनाव लड़ा. उन्हें 2,74,723 वोट मिले और वे दूसरे स्थान पर रहे. पहले स्थान पर सीपीआई के राजा राम सिंह रहे, जिन्हें 3,80,581 वोट मिले.
इरोम शर्मिला मणिपुर की आयरन लेडी इरोम शर्मिला ने 2017 में 16 साल का अनशन खत्म कर थौबल विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा. देशविदेश में पहचान और सोशल मीडिया पर समर्थन मिलने के बावजूद उन्हें महज 90 वोट मिले.
लाइक्स असली रिश्ते नहीं होते, जानिए क्यों?
समाजशास्त्री संजय भट्ट कहते हैं सोशल मीडिया पर मिलने वाले लाइक्स को रियल कनेक्शन मानना ठीक नहीं है. ये अक्सर आर्टिफिशियल रिलेशनशिप यानी बनावटी रिश्ते होते हैं. लोग बिना ज्यादा समय या मेहनत लगाए किसी पोस्ट को लाइक कर देते हैं. इसका मतलब यह नहीं कि वे उस व्यक्ति से इमोशनली से जुड़े हैं या जरूरत पड़ने पर उसका साथ देंगे.
संजय भट्ट इसे डिस्टेंस रिलेशनशिप बताते हैं.अगर किसी के 21 लाख फॉलोअर्स हैं और वह उन सभी से 1111 रुपये की मदद मांगे तो जरूरी नहीं कि लोग पैसे दे दें. इसीलिए फॉलो करने और वास्तविक रिश्ता निभाने में बड़ा अंतर है.
एक्सपर्ट संजय भट्ट कहते हैं सोशल मीडिया पर पॉपुलेरिटी के दो बड़े कारण हैं. पहला, अपनी पहचान बनाना और फेमस होना. इस पॉपुलेरिटी को कमाई में बदलना. कंपनियों के पेड प्रमोशन, मार्केटिंग डील्स, यूट्यूब और अपने प्रोडक्ट बेचने के जरिए इन्फ्लुएंसर्स कमाई करते हैं.
अब सवाल फॉलोअर्स क्या वोटर भी हैं?
समाजशास्त्री कहते हैं कि सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति की कम्युनिटी बन सकती है और वह लोगों को प्रभावित भी कर सकता है. लेकिन ये लोग जरूरी नहीं कि उसके गांव, शहर या चुनाव क्षेत्र के हों. किसी इन्फ्लुएंसर के लाखों फॉलोअर्स देशदुनिया में फैले हो सकते हैं, जबकि चुनाव में उसे सीमित क्षेत्र के मतदाताओं का समर्थन चाहिए.
बड़े स्तर पर राजनीतिक पार्टियों के लिए डिजिटल कैंपेनिंग मददगार हो सकती है. किसी राज्य या देश में बड़े पैमाने पर चलाया गया ऑनलाइन प्रचार लोगों की राय प्रभावित कर सकता है. लेकिन गांव के चुनाव में सिर्फ डिजिटल कैंपेनिंग के भरोसे जीतना मुश्किल है. वहां व्यक्तिगत संपर्क और आमनेसामने के रिश्ते अब भी अहम हैं.
सोशल मीडिया राजनीति में मददगार या हथियार?
एक्सपर्ट संजय भट्ट कहते हैं सोशल मीडिया का इस्तेमाल चुनाव में सिर्फ प्रचार के लिए नहीं, विरोधियों को घेरने के लिए भी होता है. नेताओं के पुराने पोस्ट, बयान और वीडियो चुनाव के समय निकालकर उनके खिलाफ इस्तेमाल किए जाते हैं. ऐसे में सोशल मीडिया कई बार सकारात्मक संवाद से ज्यादा राजनीतिक हमले का माध्यम बन जाता है.
सोशल मीडिया पर किसी को फॉलो करना आसान है, लेकिन वोट देने का फैसला लोग कई दूसरे आधारों पर करते हैं. उम्मीदवार की छवि, स्थानीय मुद्दे, काम, व्यवहार और जनता के साथ उसका सीधा संपर्क इसमें अहम होते हैं.
लाखों लाइक्स पॉपुलेरिटी डेटा हो सकते हैं लेकिन इलेक्शन जीतने की गारंटी नहीं डिजिटल वर्ल्ड में स्टार बनने और जमीन पर जनता का भरोसा जीतने के बीच का फासला ही इस कहानी का सबसे बड़ा सबक है.



