Featured Image

रायपुर। 28 अक्टूबर 2026| राजनांदगांव जिला प्रशासन ने आज बड़ी कार्रवाई करते हुए एक किसान के घर छापा मारकर 232 बोरा अवैघ धान पकड़ा। इसमें दिलचस्प यह है कि किसान के खेत में धान अभी लगा हुआ है। यानीे धान कटा भी नहीं है। जिला प्रशासन की टीम ने जब छापा मारा तो पता चला कि बोनस प्राप्त करने के लिए उसे महाराष्ट्र से लाया गया था। नायब तहसीलदार की पूछताछ में किसान ने स्वीकार किया कि ट्रैक्टर के जरिये महाराष्ट्र से उक्त धान लाया गया, ताकि 15 नवंबर से धानी खरीदी प्रारंभ होने पर उसे बेचा जा सके। बॉर्डर के ऐसे कई जिलों में इसी तरह पड़ोसी राज्यों से धान आ रहे हैं।

फूड विभाग के अधिकारियों का कहना है कि दूसरे राज्यों से धान मंगाने में किसानों से अधिक बिचौलिये सक्रिय भूमिका निभाते हैं, क्योंकि उनका नेटवर्क तगड़ा होता है। फिर उस धान को मार्केट से अधिक रेट में वे किसानों को टिकाते हैं। क्योंकि, धान खरीदी शुरू होते ही बाजार में धान का रेट बढ़ जाता है। वह इसलिए कि सभी को मालूम है कि किसानों के खेत में प्रति एकड़ 21 क्विटल धान होता नहीं, सो वे बाजार में ही खरीदीकर सरकार को बेचेंगे। इस चक्कर में किसानों से अधिक बिचौलिये और राईस मिलर मालामाल होते हैं। राईस मिलरों में जितनी क्षमता नहीं होती, उससे कई गुना धान मिलिंग के लिए ले लेते हैं और बिना मिलिंग किए उसे फिर से बाजार में भेज देते हैं। याने रिसाईकिलिंग।

हालांकि, कल विष्णुदेव कैबिनेट ने बिचौलियो और राईस मिलरों को बड़ा झटका देते हुए बोनस की राशि किसानों को देने का फैसला किया। बोनस की राशि का मतलब यह है कि किसान के खेत में अगर प्रति एकड़ 14 क्विंटल धान हुआ तो सात क्विंटल का उसे बोनस की राशि मिल जाएगी। इस फैसले के बाद अब उसे बाजार या कोचिये से धान खरीदकर गलत काम नहीं करना पड़ेगा। बिना किसी मशक्कत के उसे बोनस के पैसे मिल जाएंगे। सरकार ने यह फैसला इसलिए किया कि किसानों को कोई नुकसान न हो।

मंत्रिमंडल की मैराथन बैठक में साय सरकार ने धान माफिया और बिचौलियों के गठजोड़ को जड़ से खत्म करने के उद्देश्य से चालू खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 के लिए एक बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया है। नई व्यवस्था के तहत अब राज्य के 27.50 लाख से अधिक पंजीकृत किसानों को प्रति एकड़ 21 क्विंटल के तय मानक के आधार पर सीधी आर्थिक सुरक्षा का लाभ दिया जाएगा। यदि किसी किसान के खेत में पैदावार कम भी होती है, तब भी उसे अतिरिक्त धान जुटाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। किसान जितनी भी उपज उपार्जन केंद्र लाएगा, उसे उसका भुगतान मिलेगा ही, साथ ही 21 क्विंटल के कोटे में से बची हुई मात्रा की बोनस राशि भी उसके बैंक खाते में सीधे ट्रांसफर कर दी जाएगी।

बस्तर और सरगुजा के वनांचल व पहाड़ी किसानों को मिलेगा सबसे बड़ा लाभ

सरकार का यह नीतिगत बदलाव विशेष रूप से बस्तर और सरगुजा संभाग के दूरस्थ, पहाड़ी तथा असिंचित क्षेत्रों के किसानों के लिए वरदान साबित होगा। इन भौगोलिक इलाकों में सिंचाई संसाधनों की सीमा और पथरीली या हल्की मिट्टी के कारण प्रति एकड़ औसतन 12 से 15 क्विंटल ही धान की उपज हो पाती है। पुरानी व्यवस्था में 21 क्विंटल प्रति एकड़ की पूरी बोनस राशि हासिल करने के लिए इन क्षेत्रों के किसानों को बाहरी व्यापारियों या बिचौलियों से 2300 से 2400 रुपये प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदना पड़ता था। परिवहन और खरीदी केंद्र के खर्चों के बाद किसानों के हाथ में नाममात्र का लाभ बचता था, जबकि बड़ा मुनाफा दलाल कमा ले जाते थे। अब स्वत: बोनस मिलने से बस्तर और सरगुजा के छोटे व सीमांत किसानों की आय बिना किसी अतिरिक्त लागत के सुरक्षित हो गई है।

नीतिगत निर्णय के पीछे की वजह और इसका व्यापक राजनीतिक मायने

साय सरकार द्वारा धान खरीदी की व्यवस्था में यह बदलाव लाने के पीछे दो मुख्य कारण हैं—पहला, वास्तविक अन्नदाता को दलालों के शोषण से मुक्त कराना और दूसरा, राज्य के बाहर से आने वाले अवैध धान तथा कागजी री-साइक्लिंग पर पूरी तरह से नकेल कसना। अगर इसके राजनीतिक निहितार्थों को समझें तो यह फैसला छत्तीसगढ़ के ग्रामीण वोट बैंक और खासकर आदिवासी बहुल बस्तर-सरगुजा संभाग में सत्ता पक्ष की पकड़ को बेहद मजबूत करेगा। पूर्ववर्ती राजनीतिक व्यवस्थाओं में राइस मिलरों और बिचौलियों का जो समानांतर नेटवर्क खड़ा हो गया था, यह निर्णय उस पर करारा प्रहार है। सरकार ने इसके जरिए संदेश दिया है कि सरकारी खजाने का पैसा मध्यस्थों की जेब में जाने के बजाय सीधे जरूरतमंद किसान के खाते में पहुंचेगा, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी और सरकार की पारदर्शी छवि जनता के बीच और सुदृढ़ होगी।

बिचौलियों और राइस मिलरों की साठगांठ ध्वस्त

बैठक में रेखांकित किया गया कि पूर्व की व्यवस्था में वास्तविक पैदावार कम होने पर किसान बोनस का पूरा लाभ पाने के लिए बिचौलियों के पास जाने पर मजबूर होते थे। दलाल बाहर से कम दाम में धान लाकर समितियों में सरकारी रेट पर खपाते थे, जिसमें किसान को सिर्फ 400 से 500 रुपये का मामूली हिस्सा मिलता था और मुख्य कमाई बिचौलिए कर जाते थे। नई नीति से बाहर से धान लाने और समितियों में फर्जी बिलिंग कराने का पूरा खेल खत्म हो गया है। इसके साथ ही उपार्जन केंद्रों से उठाए गए धान को दोबारा घुमाकर मंडियों में बेचने की अवैध री-साइक्लिंग प्रक्रिया पर भी पूरी तरह से विराम लग गया है।

सरकारी खजाने को करीब 12 हजार करोड़ रुपये की संभावित बचत

प्रशासनिक कसावट और डिजिटल निगरानी के चलते चालू वित्तीय वर्ष में राज्य सरकार को वित्तीय मोर्चे पर भी बड़ी सफलता मिलती दिख रही है। फर्जी रकबे और अवैध आवक पर रोक लगने से खरीदी का आंकड़ा वास्तविक स्तर पर आ रहा है। खरीफ वर्ष 2023-24 में 144.92 लाख मीट्रिक टन और 2024-25 में 149.00 लाख मीट्रिक टन की रिकॉर्ड खरीदी हुई थी। इसके बाद कड़े नियमों से वर्ष 2025-26 में उपार्जन घटकर 141 लाख मीट्रिक टन रहा, जिससे करीब 5 हजार करोड़ रुपये की बचत हुई थी। इस बार बिचौलियों के पूरी तरह बेदखल होने से वास्तविक खरीदी लगभग 125 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है, जिससे राज्य के खजाने को करीब 12 हजार करोड़ रुपये की सीधी बचत होगी, जिसे विकास कार्यों में लगाया जाएगा।