20 साल तक एक आदमी रोज़ अपने दफ़्तर जाते समय एक छोटीसी दुकान के सामने से गुज़रता था. हर सुबह वह उसके बंद शटर को देखता और सोचता कि एक दिन यहाँ अपनी किताबों की दुकान खोलेगा. लकड़ी की अलमारियां होंगी, पुरानी किताबें होंगी और बच्चे ज़मीन पर बैठकर कहानियां पढ़ेंगे. पत्नी जब भी पूछती कि दुकान क्यों नहीं खोलते, उसका एक ही जवाब होता, ‘अभी सही समय नहीं आया है. पहले अच्छी तनख्वाह का इंतज़ार था. फिर बच्चों की पढ़ाई पूरी करनी थी. उसके बाद कर्ज़ चुकाना था.

साल बीतते गए, एक शाम, रिटायर होने के बाद, वह उसी दुकान के सामने रुका. अब वह दुकान किसी और ने किराए पर ले ली थी. वह बहुत देर तक चुपचाप खड़ा रहा. पत्नी ने धीरे से पूछा, आपको दुख इस बात का है कि दुकान किसी और ने ले ली, या इस बात का कि आपने कभी कोशिश ही नहीं की? उसके पास कोई जवाब नहीं था. पहली बार उसने सोचा कि क्या समय उसे रोक रहा था, या वह खुद समय का बहाना बनाकर रुका हुआ था.
हर चीज़ अपने सही समय पर होती है?
बचपन से हम सुनते आए हैं कि हर चीज़ अपने सही समय पर होती है. यह बात मुश्किल दिनों में हमें सहारा देती है. कोई बच्चा परीक्षा में असफल हो जाता है. किसी लड़की के हाथ से अच्छा अवसर निकल जाता है. कोई वर्षों तक अपनी मेहनत की पहचान का इंतज़ार करता है. हम कहते हैं, धैर्य रखो, तुम्हारा समय भी आएगा. कई बार यह सलाह सही होती है. फल को केवल इसलिए जल्दी नहीं पकाया जा सकता क्योंकि हमें भूख लगी है. बच्चा एक दिन में सब कुछ नहीं सीख सकता. कुछ चीज़ों के लिए अभ्यास, अनुभव और समय चाहिए.
लेकिन यह मान लेना कि समय अपने आप सब कुछ ठीक कर देगा, शायद हमारी भूल है. खेत में केवल मौसम बदलने से फसल नहीं उगती. किसी को मिट्टी तैयार करनी पड़ती है, बीज बोना पड़ता है और पौधों की देखभाल करनी पड़ती है. समय फसल उगाने में मदद करता है, लेकिन पूरी मेहनत हमारे बदले नहीं कर सकता.
देर से पहुंचना हमारी सबसे बड़ी भूल नहीं
हमारे मन की एक अजीब आदत है. हम अपनी तरक्की दूसरों की ज़िंदगी देखकर नापते हैं. दोस्त ने मकान खरीद लिया. साथ काम करने वाले को बड़ा पद मिल गया. पड़ोसी का बेटा सफल हो गया. अचानक हमें अपनी उपलब्धियां छोटी लगने लगती हैं. हम भूल जाते हैं कि दो लोग एक ही मंज़िल पर पहुंचकर भी अलगअलग अनुभव कर सकते हैं. एक व्यक्ति ऊंचे पद पर पहुंचकर खुश हो सकता है, जबकि दूसरा उसी पद पर पहुंचकर महसूस कर सकता है कि यह काम उसे खुशी नहीं देता. मंज़िल एक है, लेकिन उसका अर्थ दोनों के लिए अलग है. शायद देर से पहुंचना हमारी सबसे बड़ी भूल नहीं है. बड़ी भूल तब होती है जब हम केवल इसलिए किसी मंज़िल की ओर भागते रहते हैं क्योंकि कोई दूसरा वहां पहले पहुंच गया.
कैसी ज़िंदगी जीना चाहते हो?
कल्पना कीजिए, दो भाइयों को विरासत में ज़मीन मिली. बड़ा भाई तुरंत मकान बनाना चाहता था. छोटा भाई पैसे जमा होने तक इंतज़ार करना चाहता था. कुछ वर्षों बाद बड़े भाई का सुंदर मकान बन गया, लेकिन वह कर्ज़ में डूब गया. छोटे भाई ने पैसे बचा लिए, लेकिन तब तक मकान बनाना बहुत महंगा हो चुका था. दोनों एकदूसरे को गलत समझते थे. उनकी मां ने पूछा, तुम दोनों ने कभी सोचा कि उस मकान के अंदर कैसी ज़िंदगी जीना चाहते हो? दोनों चुप हो गए.
वे वर्षों तक यह तय करते रहे कि मकान कब बनाना है, लेकिन यह नहीं सोचा कि बनाना क्यों है. हमारी ज़िंदगी में भी कई बार ऐसा ही होता है. हम अगली मंज़िल तक पहुंचने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि यह पूछना भूल जाते हैं कि क्या वह मंज़िल आज भी हमारे लिए उतनी ही ज़रूरी है. इसलिए धैर्य का अर्थ केवल बैठे रहना नहीं है.
सच्चा धैर्य हमें क्या सिखाता है?
सच्चा धैर्य हमें सीखना, मेहनत करना, गलतियां सुधारना और ज़रूरत पड़ने पर रास्ता बदलना सिखाता है. एक संगीतकार रोज़ कठिन धुन का अभ्यास करता है. वह धैर्य रख रहा है. लेकिन कोई व्यक्ति संगीत सीखने के लिए अच्छे दिन का इंतज़ार करते हुए पहला कदम ही नहीं उठाता, तो वह केवल समय गुज़ार रहा है. दोनों धीरे चल रहे हैं, लेकिन आगे केवल एक बढ़ रहा है. पुरानी सीख भी यही कहती है कि हमारा अधिकार अपने कर्म पर है, हर परिणाम को अपने अनुसार बनाने पर नहीं. लेकिन हम अक्सर उलटा करते हैं. परिणाम की चिंता में लगे रहते हैं और जो काम आज कर सकते हैं, उसे कल पर छोड़ देते हैं.
जब हमारा सपना ही बदलने लगे
सवाल तब और कठिन हो जाता है जब हमारा सपना ही बदलने लगता है. 20 साल की उम्र में जो सपना देखा था, क्या 50 साल की उम्र में भी वही सपना हमारा होना ज़रूरी है? कई बार हम किसी काम में इतने वर्ष लगा चुके होते हैं कि उसे छोड़ने से डरते हैं. लगता है कि सारी मेहनत बेकार हो जाएगी. लेकिन रास्ता बदलने से पहले की यात्रा बेकार नहीं हो जाती. कभीकभी समझदारी इसी में होती है कि हम स्वीकार करें कि जो कभी बहुत ज़रूरी था, अब उतना ज़रूरी नहीं रहा.
आगे बढ़ते रहने के लिए साहस चाहिए, लेकिन रुकने के लिए भी साहस चाहिए. बस यह समझना ज़रूरी है कि हम इसलिए रुक रहे हैं क्योंकि खुद को बेहतर समझने लगे हैं, या इसलिए क्योंकि आगे बढ़ने से डर रहे हैं.
आने वाले कल के बारे में कुछ निश्चित नहीं
शायद हमारी सबसे बड़ी परेशानी यह है कि हम आने वाले कल के बारे में कुछ निश्चित नहीं जानते. इंतज़ार हमें सुरक्षित महसूस कराता है. जब तक कोशिश नहीं करेंगे, असफल भी नहीं होंगे. सपना सुंदर बना रहेगा क्योंकि हमने उसे सच करने की परीक्षा में उतारा ही नहीं. हम सोचते रहते हैं कि कभी किताब लिखेंगे, किसी से मन की बात कहेंगे, कहीं घूमने जाएंगे या अपनी पसंद का काम शुरू करेंगे. लेकिन कदम उठाते ही असफल होने का डर सामने आ जाता है. इसलिए हम सपने को सच बनाने के बजाय उसे अपने मन में संभालकर रखते हैं. इसे धैर्य कहते हैं, क्योंकि यह स्वीकार करना मुश्किल लगता है कि शायद हम डर रहे हैं.
इंतज़ार करने से सचमुच कुछ बदलेगा?
ज़रा उस एक काम के बारे में सोचिए जिसे आप लंबे समय से टाल रहे हैं. अपने आप से पूछिए कि क्या एक साल और इंतज़ार करने से सचमुच कुछ बदलेगा? क्या आप उस दौरान कुछ नया सीखेंगे? कोई तैयारी करेंगे? और अगर बदलने के लिए केवल आपका साहस ही बाकी है, तो फिर आप किसका इंतज़ार कर रहे हैं? इन सवालों का मतलब यह नहीं कि तुरंत फैसला कर लिया जाए. इनका उद्देश्य केवल यह समझना है कि हम तैयारी कर रहे हैं या कोशिश करने से बच रहे हैं.
समय हमेशा दरवाज़े नहीं खोलता. कभीकभी वह हमें समझाता है कि कुछ दरवाज़े बंद क्यों रहे. कभी वह बताता है कि जिस दरवाज़े के पीछे जाने की इच्छा थी, अब वहां जाने का मन ही नहीं रहा. और कभी वर्षों के इंतज़ार के बाद पता चलता है कि दरवाज़े पर ताला था ही नहीं. तो अगली बार जब हम खुद से कहें कि अभी सही समय नहीं आया है, क्या एक बार यह नहीं पूछना चाहिए कि हम सचमुच समय का इंतज़ार कर रहे हैं, या अपने भीतर उस हिम्मत का, जो पहला कदम उठाने के लिए चाहिए?



