एक आदमी दरवाज़ा खोलकर अंदर आता है. उसने क्या पहन रखा है, उसका चेहरा कैसा है, वह कैसे चल रहा है, हम सबसे पहले यही देखते हैं. फिर कोई बताता है, ‘ये डॉक्टर हैं. अचानक उस आदमी के बारे में हमारी समझ थोड़ी बदल जाती है. अब हमें पता है कि वह क्या करता है. फिर बातचीत आगे बढ़ती है. पता चलता है कि वह कानपुर से आया है. हम पूछते हैं, ‘क्या आप फलां व्यक्ति को जानते हैं? वह कहता है, ‘हां, उनसे मेरी अच्छी जानपहचान है. फिर पता चलता है कि उनके भाई भी उसके करीब हैं. कुछ ही मिनटों में हमने उस आदमी के बारे में बहुत कुछ तय कर लिया. उसका काम, उसका शहर, उसके रिश्ते, उसके लोग, उसकी पहचान. बिना जाने हम उसे अपने मन में एक जगह दे देते हैं.

शब्दों के साथ भी हम बिल्कुल ऐसा ही करते हैं. किसी शब्द से हमारी पहली मुलाकात उसकी आवाज़ से होती है. आवाज उसका चेहरा है. फिर हम उसका अर्थ जानते हैं. वह उसका काम है. लेकिन क्या कोई आदमी सिर्फ अपने काम से पूरा आदमी हो जाता है? नहीं. उसी तरह कोई शब्द भी केवल अपने शब्दकोश वाले अर्थ से पूरा नहीं होता. उस शब्द का भी एक जीवन होता है. वह किन शब्दों के साथ रहता है, हमने उसे किन मौकों पर सुना है, उसके साथ कौनसी याद जुड़ी है, उसे बोलने वाले की आवाज कैसी थी, उस शब्द को सुनकर हमारे भीतर क्या उठता है, ये सब मिलकर उस शब्द का असली रूप बनाते हैं.
भीतर की पूरी दुनिया अलगअलग
‘घर’ एक छोटासा शब्द है. शब्दकोश में उसका अर्थ कुछ पंक्तियों में लिखा जा सकता है. लेकिन किसी के लिए घर वह जगह है जहां मां खिड़की के पास इंतजार करती थी. किसी के लिए घर वह जगह हो सकती है, जहां से वह भागना चाहता था. बच्चे के लिए घर वह हो सकता है, जहां उसका स्कूल बैग रखा रहता है. किसी बूढ़े आदमी के लिए घर वह जगह हो सकती है जो अब इस दुनिया में है ही नहीं. शब्द एक है, लेकिन उसके भीतर की पूरी दुनिया अलगअलग है.
इसीलिए दो लोग एक ही वाक्य सुनकर भी बिल्कुल अलग महसूस कर सकते हैं. एक पिता अपने बेटे से कहता है, ‘मर्द बनो. पिता के लिए इसका अर्थ हो सकता है, ‘बहादुर बनो. लेकिन बेटा शायद सुनता है, ‘रोना मत. एक ही शब्द दो अलग जीवनों में जाकर दो अलग अर्थ बना देता है.
दुनिया देखने का तरीका
हम बोलते समय अक्सर यह नहीं देखते. हमें लगता है कि हम केवल शब्द बोल रहे हैं. लेकिन कई बार शब्द भी हमें चला रहे होते हैं. जिस शब्द को हम बारबार बोलते हैं, वह धीरेधीरे हमारी दुनिया देखने का तरीका बन जाता है. ‘सफलता’ हमारे लिए सिर्फ पैसा बन सकती है. ‘असफलता’ शर्म बन सकती है. ‘वफादारी’ किसी दिन केवल आज्ञा मानना बन सकती है. ‘आजादी’ का मतलब कुछ भी करने की छूट हो सकता है. ‘सम्मान’ का मतलब डर हो सकता है. हम किसी शब्द को अपने मन में एक छोटासा कमरा देते हैं और धीरेधीरे वही कमरा पूरा घर बन जाता है.
पुरानी बुद्धिमानी हमें बारबार याद दिलाती रही है कि किसी चीज का नाम उस चीज़ से बड़ा नहीं होता. नाम रास्ता दिखा सकता है, लेकिन पूरी सच्चाई अपने भीतर नहीं रख सकता. शायद इसीलिए समझदार आदमी केवल यह नहीं सुनता कि क्या कहा गया है. वह यह भी देखता है कि उस शब्द का अर्थ किस तरह बनाया गया है. एक और बात है. शब्द उन लोगों का स्वभाव भी अपने साथ ले जाते हैं जो उन्हें बोलते हैं.
गलत काम को सही ठहराना
अगर किसी अच्छे शब्द का इस्तेमाल बारबार किसी गलत काम को सही ठहराने के लिए हो, तो वह शब्द भी हमारे मन में बदलने लगता है. ‘प्यार’ अगर किसी को अपने कब्ज़े में रखने के लिए इस्तेमाल हो, तो प्यार धीरेधीरे अधिकार जैसा सुनाई देने लगता है. ‘सच’ अगर किसी को चोट पहुंचाने के लिए बोला जाए, तो सच भी कठोर लगने लगता है. शब्दकोश वही रहता है. लेकिन इंसान के भीतर उसका अर्थ बदल जाता है.
मैंने केवल वही मान लिया है जो मुझे बताया गया?
शायद हमें अपने लिए एक छोटासा प्रयोग करना चाहिए. कोई ऐसा शब्द चुनिए जिसे आप रोज बोलते हैं. उसे लिखिए. फिर अपने आप से पूछिए, मैंने इस शब्द का अर्थ सीखा कहां से? मातापिता से? स्कूल से? दोस्तों से? समाज से? किसी दुखद अनुभव से? किसी ऐसे व्यक्ति से जिस पर आपने भरोसा किया था? फिर उससे भी बड़ा सवाल पूछिए, क्या सच में इस शब्द का यही अर्थ है, या मैंने केवल वही मान लिया है जो मुझे बताया गया?
जीवन में एक नई यात्रा शुरू
शायद यहीं से जीवन में एक नई यात्रा शुरू हो सकती है. क्योंकि हम भी शब्दों की तरह हैं. लोग हमें हमारे काम, हमारे परिवार, हमारी सफलता, हमारी असफलता, हमारे रिश्तों और हमारी पहचान से समझते हैं. लोग हमारे बारे में वाक्य बनाते हैं. धीरेधीरे हम उन्हीं वाक्यों को सच मानने लगते हैं. और कभीकभी पूरी जिंदगी ऐसी परिभाषा में जी देते हैं जो हमने खुद लिखी ही नहीं थी.
शायद असली यात्रा उस दिन शुरू होती है, जब हम अपने बारे में लिखी हुई परिभाषा को पहली बार ध्यान से पढ़ते हैं. और फिर अपने आप से पूछते हैं: अगर मेरी जिंदगी का शब्दकोश कभी खुला, तो उसमें मेरा अपना अर्थ मिलेगा या वही, जो दूसरों ने मेरे लिए लिख दिया है?



