भारतीय जनता पार्टी ने 25 जून को यूपी में अपनी नई टीम का ऐलान कर दिया है. केंद्रीय और राज्य नेतृत्व ने साल 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव और साल 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए 46 पदाधिकारियों के नामों की सूची जारी कर अपनी नई संगठनात्मक टीम का आधिकारिक ऐलान कर दिया है. सूची जारी होने के बाद बीजेपी के नवनियुक्त पदाधिकारियों में सबसे ज्यादा चर्चा सपा की बागी विधायक पूजा पाल की है.

बीजेपी ने पूजा पाल को पार्टी में उपाध्यक्ष का पद दिया है. इसका अर्थ यह हुआ कि पूजा पाल की अब औपचारिक तौर पर बीजेपी में एंट्री हो गई है. सिर्फ यही नहीं, कैबिनेट विस्तार के दौरान योगी आदित्यनाथ की मंत्रिपरिषद में शामिल होने की दौड़ में पाल शामिल बताई जा रही थीं, लेकिन कहा जाता है कि आखिरी वक्त में वह चूक गईं.

बीजेपी की नई प्रदेश टीम में पूजा पाल को एंट्री मिलने, साथ ही सपा और बसपा के प्रदेश अध्यक्ष भी इसी समाज से होने के चलते एक बात तो साफ हो गई है कि यूपी की राजनीति में अब यह समाज एक जरूरी चुनावी समीकरण बन चुका है. बसपा और सपा के सोशल इंजीनियरिंग कहे जाने वाले इस समाज पर बीजेपी ने पूजा पाल को एंट्री देकर बड़ा दांव खेला है.

मुख्य बातें

  • यूपी के बदलती राजनीतिक के बीत पाल समाज जरूरी चुनावी समीकरण बन गया.
  • तकरीबन दो दर्जन सीटों पर जीतहार में निर्णायक भूमिका निभा सकता है पाल समाज.
  • यूपी में अब चुनाव बड़ी जातियों की बजाय छोटी जातियों के इर्दगिर्द घूमने लगा है.
  • सपाबसपा के बाद अब बीजेपी ने भी पाल समाज पर खेला है दांव.

यूपी की राजनीति में गैरयादव पिछड़े वर्गों की अहमियत बढ़ी

यूपी की राजनीति में इस वक्त गैरयादव पिछड़े वर्गों की अहमियत बेहद तेजी से बढ़ रही है. इसमें कुर्मी, मौर्यकुशवाहा, लोध समाज, मल्लाहनिषाद, लोनियाचौहान, राजभर समाज, लोहार और कुम्हार जाति के साथ पालगड़रियाबघेल भी शामिल हैं. बता दें कि यूपी में पाल, गड़रिया, बघेल और धनगर समुदाय को व्यापक रूप से एक ही सामाजिक समूह के रूप में देखा जाता है.

उत्तर प्रदेश में पाल समुदाय की आबादी कितनी है?

साल 2001 में तत्कालीन राजनाथ सिंह सरकार के दौरान गठित सोशल जस्टिस कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी में शेफर्डपालबघेल समुदाय की आबादी करीब 4.43 फीसदी थी. अगर प्रदेश की वर्तमान आबादी 25 करोड़ मानी जाए तो इस हिसाब से पाल समुह के जातियों की जनसंख्या एक करोड़ दस लाख के आसपास आती है.हालांकि यह एक अनुमान है, कोई आधिकारिक जनगणना आंकड़ा नहीं है. दरअसल, भारत में आखिरी व्यापक जातिवार जनगणना साल 1931 में बाद नहीं हुई है.

चुनावों में निर्णायक भूमिका निभा सकता है पाल समुदाय

2001 में आई हुकुम सिंह समिति रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में कुर्मी जनसंख्या 7.46% ,कच्छीकुशवाहाशाक्यमौर्यसैनीमाली समूह 6.69% और यादवों की आबादी है 19.4% है. ऐसे में संख्या के लिहाज से पाल समाज की आबादी इतनी बड़ी भले ना हो, लेकिन कई क्षेत्रों में इनकी निर्णायक उपस्थिति चुनावी परिणामों पर प्रभाव डाल सकती है.

पाल समाज काबुंदेलखंड के झांसी, ललितपुर, जालौन, महोबा, हमीरपुर अच्छा खासा प्रभाव माना जाता है. मध्य और पश्चिमी यूपी के कन्नौज, इटावा, मैनपुरी, फर्रुखाबाद, हरदोई जैसे जिलों में उनकी अच्छी उपस्थिति है. अवध क्षेत्र में लखनऊ, बाराबंकी और अयोध्या, गोंडा में उनका ठीकठाक प्रभाव है. इसके पूर्वांचल के प्रयागराज, मिर्जापुर, वाराणसी, सोनभद्र, कौशांबी में भी उनकी भूमिका निर्णायक है.

राजनीति विशेषज्ञों का मानना है कि पाल समाज प्रदेश की तकरीबन 2 दर्जन से अधिक सीटों पर चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है. जिन सीटों पर मुकाबला बेहद कड़ा होगा, वहां इनका महत्व बढ़ जाएगा. यहां महज एक से दो फीसदी वोट शेयर इधरउधर होने जीतहार का अंतर तेजी से बदल सकता है. यही वजह है बसपा, सपा के बाद बीजेपी ने पाल समाज पर दांव खेला है.

सपा और बसपा पहले ही पाल समुदाय पर खेल चुकी हैं दांव

समाजवादी पार्टी ने इसी वोटबैंक को अपने पक्ष में करने के लिए श्याम लाल पाल को अपना प्रदेश अध्यक्ष बना रखा है. श्याम लाल पाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि सपा सिर्फ यादवों की पार्टी नहीं, बल्कि गैरयादव पिछड़ों को भी नेतृत्व में हिस्सेदारी दे रही है.

बिल्कुल इसी तरह बसपा भी यह संदेश देना चाहती थी कि वह सिर्फ दलितों की पार्टी नहीं है, बल्कि पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों को भी वह नेतृत्व में हिस्सेदारी दे रही है. इसी के चलते विश्वनाथ पाल की प्रदेश अध्यक्ष पद पर नियुक्ति हुई. इसके जरिए मायावती दलित वोट बैंक के साथसाथ अति पिछड़ी जातियों को भी दोबारा बसपा के साथ जोड़ा जाए, जो पिछले चुनावों में बीजेपी में चला गया था.

अब बीजेपी ने की पाल समुदाय को लुभाने की कोशिश

बीजेपी के पास यूपी की राजनीति में पाल समुदाय को साधने के लिए कोई खास चेहरा नहीं था. लेकिन अब पूजा पाल को पार्टी का प्रदेश उपाध्यक्ष और प्रकाश पाल को पिछड़ा मोर्चा अध्यक्ष बनाकर इस खाली जगह को भरने की कोशिश की गई. पूजा पाल के जरिए बीजेपी पाल समाज को साधना चाहती है. साथ में महिला और अपराध के मुद्दे पर भी समाजवादी पार्टी को घेरना चाहती है.

यही वजह है जब माफिया अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की हत्या के बाद पूजा पाल ने सार्वजनिक मंचों पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की खुलकर तारीफ की. फिर समाजवादी पार्टी ने अनुशासनहीनता के आरोप में उन्हें निष्कासित कर दिया तो बीजेपी ने पूजा पाल साथ खड़े होने से कोई गुरेज नहीं किया. इस दौरान पूजा पाल लगातार समाजवादी पार्टी के नेतृत्व पर हमलावर भी रहीं,जिसका इनाम अब जाकर उन्हें मिल गया.

अब बड़ी नहीं छोटी जातियां बदलेंगी चुनाव का खेल

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है. अब यह सिर्फ बड़ी जातियों के इर्दगिर्द नहीं घूमती है. छोटी और मध्यम आबादी वाली पिछड़ी जातियों का संयुक्त वोट बैंक भी किसी पार्टी को अर्श से फर्श और फर्श से अर्श तक पहुंचाने का माद्दा रखता है. यही वजह है प्रदेश में पाल समाज जैसी जातियां अब सिर्फ वोटर नहीं, बल्कि सत्ता के समीकरण तय करने वाले समूह बन चुके हैं और पार्टियां इन्हें लुभाने में लगी हुई हैं.