भारतीय ग्राहक ज्यादातर कीमत और उपयोगिता के बेस पर इलेक्ट्रिक गाड़ियां खरीदते हैं. मौजूदा समय में अब इसमें थोड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. जैसेजैसे राज्यों की पॉलिसीज कीमतों को तय कर रही हैं, वैसे वैसे खरीदारों के प्रोफाइल में अब अलगअलग क्षेत्रों में काफी अंतर देखने को मिल रहा है. बेंगलूरू में एक युवा प्रोफेशनल एक कार डीलर के शोरूम में हाइब्रिड कार खरीदने के इरादे से गया.

राज्यों की नई चाल, EV मार्केट ने पकड़ी रफ्तार! इंसेंटिव के दम पर भारत में बढ़ा इलेक्ट्रिक वाहनों का क्रेज
राज्यों की नई चाल, EV मार्केट ने पकड़ी रफ्तार! इंसेंटिव के दम पर भारत में बढ़ा इलेक्ट्रिक वाहनों का क्रेज

उसे यह ज्यादा सुरक्षित विकल्प लगा. लेकिन जब सेल्सपर्सन ने उसे गाड़ी की फाइनल ऑनरोड कीमत बताई, तो उसका इरादा बदल गया. कर्नाटक की इलेक्ट्रिक मोबिलिटी पॉलिसी ने, रोड टैक्स में छूट और कम रजिस्ट्रेशन शुल्क के जरिए, गाड़ी की शुरुआती कीमत में अंतर को उम्मीद से कहीं ज्यादा कम कर दिया था. इसमें गाड़ी चलाने का कम खर्च भी जोड़ दें, तो उसका फैसला पूरी तरह बदल गया.

वह एक इलेक्ट्रिक Mahindra XEV 9e लेकर शोरूम से बाहर निकला. इरादे में आया यह आखिरी समय का बदलाव ही अब इलेक्ट्रिक गाड़ियों के ट्रेंड को तेजी से आगे बढ़ा रहा है, और इससे यह समझने में मदद मिलती है कि महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश जैसे राज्य EV के क्षेत्र में विकास के मुख्य केंद्र के तौर पर क्यों उभर रहे हैं. वित्त वर्ष 2026 में, भारत का EV बाजार लगातार बढ़ता रहा.

नीतिगत समर्थन और बढ़ती जागरूकता

उद्योग के अनुमानों के मुताबिक, EV बाजार में सभी सेगमेंट को मिलाकर लगभग 2527 लाख यूनिट की बिक्री हुई. फिर भी, EV को अपनाने की गति हर जगह एक जैसी नहीं है. कुछ ही राज्य इस बिक्री में सबसे ज़्यादा योगदान दे रहे हैं. कुल बिक्री के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है, जहां वित्त वर्ष 2026 में लगभग 6 लाख EV बिकीं. इनमें ज्यादातर इलेक्ट्रिक तिपहिया वाहन थे. यहां, EV को अपनाने की मुख्य वजह आर्थिक लाभ है. गाड़ी चलाने वालों के लिए, EV का मतलब पर्यावरण की सुरक्षा से ज्यादा, फ्यूल और मेंटेनेंस पर होने वाले कम खर्च के जरिए अपनी रोज की कमाई बढ़ाना है.

मुंबई और बेंगलूरू में कितनी सेल्स

महाराष्ट्र में लगभग 4 लाख EV की बिक्री हुई, जो एक ज्यादा डायवर्सिफाइड मार्केट को दर्शाता है. नीतिगत समर्थन—जिसमें खरीदने पर मिलने वाली छूट, पुरानी गाड़ी को कबाड़ में देने पर मिलने वाले फायदे, और चार्जिंग इंफ़्रास्ट्रक्चर में शुरुआती निवेश शामिल हैं—ने निजी और कमर्शियल, दोनों ही सेगमेंट में EV को अपनाने में मदद की है. मुंबई और पुणे जैसे शहरों में इलेक्ट्रिक यात्री वाहनों की मांग तेजी से बढ़ रही है, और साथ ही दोपहिया वाहनों की बिक्री में भी जबरदस्त उछाल देखने को मिल रहा है. बेंगलुरु के दम पर कर्नाटक एक प्रमुख शहरी बाजार के तौर पर उभरा है. यहां के ग्राहक गाड़ी की कुल लागत पर ज्यादा ध्यान देते हैं. टैक्स में छूट, तेजी से होने वाला रजिस्ट्रेशन और बेहतर होता चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, ये सभी EV को अपनाने में लगातार मदद कर रहे हैं.

तमिलनाडु और बंगाल में भी बढ़ी सेल

तमिलनाडु में लगभग 1.52 लाख EV की बिक्री हुई है. इस राज्य को दोहरी भूमिका निभाने का फायदा मिलता है—यह EV बनाने का एक बड़ा सेंटर भी है और EV की खपत का एक बड़ा बाज़ार भी. इस वजह से यहां मांग और सप्लाई, दोनों ही साथसाथ बढ़ रही हैं. पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश में, जहां बिक्री का अनुमान लगभग 11.5 लाख यूनिट प्रति राज्य है, EV की मांग को तय करने में ‘किफायती कीमत’ की भूमिका सबसे अहम है. दो और तीनपहिया वाहनों के लिए दिए जा रहे इंसेंटिव पहली बार खरीदने वालों और छोटे व्यवसायों को आकर्षित कर रहे हैं, जिससे EV आय पैदा करने वाली संपत्ति के रूप में स्थापित हो रहे हैं.

सेल बढ़ने की बड़ी वजह

इन बाज़ारों को जो चीज आपस में जोड़ती है, वह सिर्फ नीतिगत महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि उसका क्रियान्वयन है. फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष साई गिरिधर ने कहा, कंज्यूमर तब रिस्पांस करते हैं, जब इंसेंटिव साफ और अनुमानित होते हैं, जिससे खरीदारी के समय होने वाली हिचकिचाहट कम हो जाती है. उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि यह बदलाव अब सिर्फ नीतियों की वजह से ही नहीं हो रहा है. AutoNxt Automation के फाउंडर और CEO कौस्तुभ धोंडे ने कहा कि इन राज्यों में EV को अपनाने की गति इंसेंटिव के साथसाथ ICE वाहनों से दूर हटकर एक स्पष्ट आर्थिक बदलाव के कारण भी बढ़ रही है.