दिल्ली में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को लेकर चुनाव आयोगा और याचिकाकर्ताओं के बीच नया विवाद खड़ा हो गया है. मामला उन लोगों के नाम दोबारा वोटर लिस्ट में शामिल कराने का है, जिन्हें SIR के दौरान ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से बाहर कर दिया गया. चुनाव आयोग ऐसे लोगों से नाम जुड़वाने के लिए फॉर्म6 भरने को कह रहा है. आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि पहले से वोटर रहे व्यक्ति के फॉर्म6 भरने पर सिर्फ इस वजह से उसके खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी कि वह पहले भी मतदाता था.

लेकिन याचिकाकर्ताओं को आयोग का यह तरीका मंजूर नहीं है. उनका सवाल है कि जो लोग पहले से वोटर थे और जिनका नाम किसी वजह से SIR के दौरान कट गया, उन्हें नए वोटर की तरह फॉर्म6 क्यों भरना पड़े? उनका कहना है कि ऐसे लोगों के लिए फॉर्म8 या एन्यूमरेशन फॉर्म जमा करने का विकल्प होना चाहिए. इसी विवाद को लेकर 4 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण पर आपत्ति जताई गई. अब इस मामले में 19 नवंबर को अगली सुनवाई होनी है. ऐसे में सवाल उठता है कि चुनाव आयोग पहले वोट दे चुके वोटरों से आखिर फॉर्म6 भरवाने पर क्यों अड़ा हुआ है?
फॉर्म6 भराने पर क्यों अड़ा है चुनाव आयोग?
चुनाव आयोग का कहना है कि SIR के दौरान जिन लोगों का नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में नहीं है, उन्हें अंतिम वोटर लिस्ट में नाम शामिल कराने के लिए नए सिरे से आवेदन करना होगा. इसके लिए फॉर्म6 का इस्तेमाल किया जा सकता है. आयोग के मुताबिक, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि संबंधित व्यक्ति पहले वोटर था या नहीं. अगर उसका नाम मौजूदा ड्राफ्ट लिस्ट में नहीं है, तो उसे दोबारा नाम जुड़वाने की प्रक्रिया पूरी करनी होगी.
3 नवंबर को आयोग ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को भेजे पत्र में इस बात को स्पष्ट किया. आयोग ने कहा कि पहले से वोटर रहे व्यक्ति के फॉर्म6 भरने को सिर्फ इस आधार पर गलत घोषणा नहीं माना जाएगा कि वह पहले भी वोटर लिस्ट में शामिल था. आयोग ने यह भी कहा कि ऐसे व्यक्ति के खिलाफ जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 की धारा 31 के तहत केवल इसी वजह से कार्रवाई नहीं की जाएगी.
क्या है फॉर्म6 और इसमें कानूनी पचड़ा?
फॉर्म6 और फॉर्म8 दोनों का इस्तेमाल वोटर लिस्ट से जुड़े कामों के लिए होता है, लेकिन इनका उद्देश्य अलगअलग है. फॉर्म6 का इस्तेमाल पहली बार वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए किया जाता है. वहीं, इसमें आवेदक को जरूरी घोषणाएं करनी होती हैं. विवाद इसलिए है क्योंकि पहले से वोटर रहे व्यक्ति को भी फॉर्म6 भरने के लिए कहा जा रहा है.
इसमें कानूनी पचड़ा जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 की धारा 31 को लेकर है. इस धारा के तहत वोटर रजिस्ट्रेशन से जुड़े आवेदन या घोषणा में जानबूझकर गलत जानकारी देने पर कार्रवाई का प्रावधान है. इसके तहत एक साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.
याचिकाकर्ताओं की चिंता है कि अगर कोई व्यक्ति पहले से वोटर रहा है और अब फॉर्म6 में पहली बार नाम जुड़वाने से जुड़ी घोषणा करता है, तो उसकी पुरानी वोटर पहचान और नई घोषणा के बीच कानूनी विरोधाभास पैदा हो सकता है. उसे डर है कि कहीं इसे गलत घोषणा न मान लिया जाए.
हालांकि, चुनाव आयोग ने 3 नवंबर को इस आशंका को दूर करने की कोशिश की. आयोग ने स्पष्ट किया कि सिर्फ पहले से वोटर होने के बावजूद फॉर्म6 भरने के आधार पर किसी के खिलाफ धारा 31 के तहत कार्रवाई नहीं होगी. लेकिन यह छूट इस शर्त पर है कि आवेदक का नाम किसी दूसरी लोकसभा या विधानसभा क्षेत्र की वोटर लिस्ट में पहले से दर्ज न हो और उसकी बाकी घोषणाएं कानून के मुताबिक सही हों.
फॉर्म8 क्या है, याचिकाकर्ता इसे क्यों चाहते हैं?
- फॉर्म8 का इस्तेमाल पहले से वोटर लिस्ट में शामिल व्यक्ति की जानकारी में बदलाव या सुधार कराने के लिए किया जाता है. इसमें मुख्य रूप से पता बदलने, दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में शिफ्ट होने, वोटर कार्ड में सुधार और कार्ड बदलने जैसी सुविधाएं शामिल हैं.
- याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अगर कोई व्यक्ति पहले से वोटर था और नौकरी या किसी अन्य वजह से उसका पता बदल गया है, तो उसे फॉर्म6 भरने के बजाय फॉर्म8 के जरिए अपना पता अपडेट कराने की सुविधा मिलनी चाहिए. इससे उसकी पुरानी वोटर पहचान भी बनी रहेगी और उसे नए मतदाता की तरह आवेदन भी नहीं करना पड़ेगा.
- चुनाव आयोग फॉर्म8 इसलिए नहीं भरवा रहा क्योंकि आयोग के मुताबिक SIR के दौरान जिन लोगों का नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हट गया है, उन्हें केवल पता बदलने वाला वोटर नहीं, बल्कि दोबारा वोटर लिस्ट में शामिल होने का आवेदन करने वाला व्यक्ति माना जाएगा, जबकि फॉर्म8 सुधार के लिए होता है.
- 28 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मुद्दे पर चुनाव आयोग से सवाल किया था. कोर्ट ने पूछा था कि जब किसी व्यक्ति का नाम 2026 की वोटर लिस्ट में था और वह सिर्फ पता बदलने या एन्यूमरेशन फॉर्म नहीं मिलने की वजह से SIR प्रक्रिया में शामिल नहीं हो पाया, तो उसे नए वोटर की तरह फॉर्म6 भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है?
- कोर्ट ने सुझाव दिया था कि ऐसे लोगों को फॉर्म8 या एन्यूमरेशन फॉर्म जमा करने का विकल्प दिया जा सकता है. साथ ही, जिन लोगों के नाम ड्राफ्ट लिस्ट से हटाए गए हैं, उनकी सूची सार्वजनिक करने और उन्हें BLO के संपर्क में लाने की व्यवस्था करने की बात भी कही थी.
जयराम रमेश ने भी उठाए सवाल
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने चुनाव आयोग के फॉर्म6 पर दिए गए स्पष्टीकरण को लेकर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि आयोग का यह स्पष्टीकरण समस्या का समाधान करने के बजाय शब्दों का खेल है. फॉर्म6 में साफ तौर पर पूछा जाता है कि क्या आवेदक पहली बार वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए आवेदन कर रहा है, जबकि SIR में पहले से वोटर रहे लोगों से भी यही फॉर्म भरवाया जा रहा है. जयराम रमेश के मुताबिक, आयोग पहले लोगों से ऐसी घोषणा करवा रहा है जो उनके पुराने वोटर रिकॉर्ड से मेल नहीं खाती और अब उन्हें कानूनी कार्रवाई से सुरक्षा देने की बात कर रहा है.
उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से भी इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए जाने और गोवा में बॉम्बे हाईकोर्ट में चल रहे मामले का जिक्र किया. जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि SIR की प्रक्रिया वोटरों को सूची से बाहर करने के उद्देश्य से बनाई गई है, जिसमें पहले नाम हटाए जा रहे हैं और फिर लोगों से नए वोटर की तरह नाम जुड़वाने को कहा जा रहा है. उन्होंने SIR रोकने की मांग की.



