एक कहावत है जो बारबार दोहराई जाती है मां का दूध बच्चे का पहला टीका होता है. ऐसी बातें बिना वजह नहीं चलतीं क्योंकि ये बात असल में सही है. कोलोस्ट्रम, वह सुनहरे रंग का तरल जो बच्चे के जन्म के कुछ दिनों बाद माँ के शरीर में बनता है, उसमें कई अच्छी चीज़ें और सुरक्षा देने वाले तत्व होते हैं. यह ठीक उसी समय मिलता है जब नवजात शिशु के पास अपनी कोई सुरक्षा नहीं होती. मां का दूध नवजात की सेहत के लिए वरदान है और इसके महत्व को समझाने के लिए हर साल 1 से 7 अगस्त के बीच में ब्रेस्टफीडिंग वीक मनाया जाता है.

ब्रेस्टफीडिंग वीक की शुरुआत साल 1992 में हुई. इसके जरिए महिलाओं को ये समझाना है कि बच्चे के लिए उसकी मदर का मिल्क कितना जरूरी है. आज के समय में माएं पाउडर वाले मिल्क की हेल्प लेने लगी है. इससे बच्चे को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाते. एक्सपर्ट से जानें बच्चे के लिए क्यों जरूरी है मां का दूध?
ब्रेस्टफीडिंग वीक कैसे शुरू हुआ?
ये वीक हर साल 1 से 7 अगस्त तक मनाया जाता है और इसकी शुरुआत 1992 में हुई थी, जब ‘वर्ल्ड अलायंस फ़ॉर ब्रेस्टफ़ीडिंग एक्शन’ ने ‘वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन’ और UNICEF के साथ मिलकर इसे शुरू किया था. तीस साल बाद भी, इन दोनों ऑर्गनाइज़ेशन का इस हफ़्ते के आयोजन पर काफ़ी असर है. वे हर साल इसके लिए एक थीम चुनते हैं. वे सीखनेसिखाने का ऐसा मटेरियल तैयार करते हैं जो क्लीनिक और लोकल ग्रुप तक पहुंचता है. ये खबर आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है।
आयुर्वेद क्या कहता है?
यह समझना जरूरी है कि ब्रेस्ट मिल्क असल में कैसे काम करता है? ये समाचार आप हिमाचली खबर में पढ़ रहे है। क्योंकि यह जितना लोग सोचते हैं, उससे कहीं ज्यादा अनोखा और हालात के हिसाब से बदलने वाला होता है. यह कोई एक जैसा फॉर्मूला नहीं है. हर बार दूध पिलाने पर इसका कंपोजिशन बदलता रहता है और उस समय बच्चे को जिसकी जरूरत होती है, उसके हिसाब से यह खुद को ढाल लेता है. खासकर कोलोस्ट्रम में एंटीबॉडी भरपूर मात्रा में होती हैं, जो सीधे मां की अपनी इम्यून हिस्ट्री से आती हैं. यह एक तरह की विरासत में मिली सुरक्षा है, जो ठीक उसी समय बच्चे को मिलती है जब उसके पास अपनी कोई सुरक्षा नहीं होती.
बच्चे से दूर रहती हैं ये परेशानियां
शुरुआती महीनों में सिर्फ मां का दूध पीने वाले बच्चे डायरिया या सांस के संक्रमण जैसी बीमारियों से दूर रहते है. यह कोई मामूली या अतिरिक्त फायदा नहीं है. जिस बच्चे के पास अभी अपनी कोई रोगप्रतिरोधक क्षमता नहीं है, उसके लिए अक्सर यही सुरक्षा का एकमात्र वास्तविक जरिया होता है.
बच्चे और मां दोनों को फायदा
इसके फायदे दोनों तरफ होते हैं. ब्रेस्टफीडिंग से ऑक्सीटोसिन हार्मोन निकलता है, जो डिलीवरी के बाद गर्भाशय को सिकुड़ने और ब्लीडिंग कम करने में मदद करता है. कभीकभी यह भी कहा जाता है की, यह सिर्फ एक बॉन्डिंग हार्मोन नहीं है, बल्कि एक असली शारीरिक सुरक्षा है. ब्रेस्टफ़ीडिंग ब्रेस्ट और ओवेरियन कैंसर, टाइप 2 डायबिटीज़ और दिल की बीमारियों का जोखिम भी कम करता है.
यह एक ऐसी सुरक्षा है जो सालोंसाल धीरेधीरे बनती है और डॉक्टर के क्लिनिक के बाहर शायद ही कभी इसकी चर्चा होती है. इसे परफेक्शन की जरूरत नहीं है. ज़रूरी नहीं कि माँ ठीक छह महीने तक ही स्तनपान कराए या सिर्फ स्तनपान ही कराए. हर एक अतिरिक्त दिन मायने रखता है. जब कोई मुश्किल लैच को ठीक करने में मदद करता है और स्तनपान ठीक से हो पाता है, यह बच्चे की इम्यूनिटी के लिए और माँ की सेहत के लिए भी फायदेमंद होता है.
आयुर्वेद के अनुसार ब्रेस्टफीडिंग के फायदे
आयुर्वेद में बच्चे और मां, दोनों के लिए स्तनपान के फायदों को बहुत महत्व दिया गया है. जन्म के समय से ही यह बच्चों के लिए सबसे अच्छा आहार रहा है. आयुर्वेद के अनुसार, मां का दूध अमृत के समान होता है और शिशुओं के लिए सबसे अच्छा आहार है. यह ‘रस धातु’ से बनता है, जो शरीर को पोषण देने वाला मुख्य ऊतक है. मां के खानपान, जीवनशैली, भावनात्मक स्थिति और शरीर के दोषों का इस पर असर पड़ता है.
डॉ. चंचल शर्मा का मानना है कि आप जो खातेपीते हैं, उसका सीधा असर आपकी एनर्जी लेवल, मूड और दूध बनने की प्रक्रिया पर पड़ता है. पोषक तत्वों से भरपूर डाइट आपके शरीर को रिकवर करने और दूध का बहाव बनाए रखने में मदद करती है.



