सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दिल्ली नेशनल कैपिटल रीजन में प्रिवेंटिव पुलिसिंग , पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए कई जरूरी निर्देश जारी किए हैं. ड्राइवर का वेरिफिकेशन और यूनिफॉर्म जरूरी किए जाने के अलावा ‘ब्लाइंड स्पॉट’ वाली जगहों से असामाजिक तत्वों को हटाए जाने समेत कई बातों पर पुलिस को नजर बनाए रखने को कहा गया है.

ये निर्देश कोर्ट द्वारा शुरू की गई स्वतः संज्ञान कार्यवाही का हिस्सा हैं. यह कार्यवाही दिल्लीNCR में हाल ही में रेप की कई घटनाओं के सामने आने के बाद शुरू की गई है, जिसमें एक घटना एक पब्लिक पार्क में किशोरी के साथ रेप की भी शामिल है. अपने आदेश में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने इस बात पर जोर दिया कि पब्लिक सेफ्टी के लिए घटना के बाद की कार्यवाही की जगह जमीनी स्तर पर लगातार मौजूदगी जरूरी है.

ड्राइवर का वेरिफिकेशन, वेरिफाइड नामफोटो अनिवार्य

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि बिना निगरानी वाले अंधेरे इलाके, खराब स्ट्रीट लाइट और अवैध खानेपीने की जगहें महिलाओं के खिलाफ अपराधों को सीधे तौर पर बढ़ावा देती हैं. कोर्ट ने 5 अक्टूबर के अपने नए आदेश में कहा कि पब्लिक सेफ्टी को केवल अपराध होने के बाद की प्रतिक्रिया के नजरिए से नहीं देखा जा सकता. पब्लिक जगहों का रखरखाव, पुलिस की पेट्रोलिंग और निगरानी की मौजूदगी, और बताई गई कमियों को कितनी तेजी से दूर किया जाता है, ये सभी बातें अपराध रोकने के लिए उतनी ही जरूरी हैं.

कागजी कार्रवाई और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को कम करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट की ओर से कुछ अहम निर्देश भी जारी किए गए हैं. इसके तहत बसों और कैब के लिए ड्राइवर का वेरिफिकेशन अनिवार्य होगा. सरकारी या प्राइवेट बसों, ऐपबेस्ड एग्रीगेटर्स और प्राइवेट कैब या ऑटो ड्राइवरों और सहायकों का सख्ती से वेरिफिकेशन किया जाए. गाड़ियों के अंदर यात्रियों को साफ दिखने वाली जगह पर वेरिफाइड नाम और फोटो लगाए जाने चाहिए.

नियमों का पालन नहीं होने पर जब्त हो गाड़ी

साथ ही इन लोगों के लिए यूनिफॉर्म पहनना जरूरी हो और बिना इजाजत गाड़ी किसी और को चलाने के लिए देने यानी सबलेटिंग पर रोक लगाई जाए. नियमों का पालन नहीं किए जाने की सूरत में गाड़ी जब्त की जाएगी और ड्राइवर को सस्पेंड कर दिया जाएगा.

इसके अलावा दिल्ली पुलिस के प्रमुख और मुख्य सचिव को खास कंट्रोल रूम कमांड सेंटर या वॉर रूम के होने, उनके दायरे और रियलटाइम रिस्पॉन्स प्रोटोकॉल के बारे में एक संयुक्त रिपोर्ट देनी होगी.

SOS प्रोटोकॉल का पालन और गाड़ी की ट्रैकिंग

अधिकारियों को SOS अलर्ट के लिए रिस्पॉन्स प्रोटोकॉल, तय यूनिट और कार्रवाई में लगने वाले समय का रिकॉर्ड रखना होगा. कोर्ट ने एस. राजशेखरन बनाम भारत संघ मामले में अपने पहले के फैसले के अनुसार पब्लिक ट्रांसपोर्ट में व्हीकल ट्रैकिंग सिस्टम डिवाइस के मूल्यांकन का भी आदेश दिया.

खानेपीने की अवैध जगहों और रुकावटों पर सख्ती

कोर्ट की ओर से पुलिस को निर्देश दिया गया कि वे गैरकानूनी तरीके से खड़ी भारी गाड़ियों को हटाएं जिनसे ‘ब्लाइंड स्पॉट’ बनते हैं, अवैध शराब की दुकानों या खानेपीने की जगहों को हटाएं और शराब की दुकानों के पास फालतू घूम रही भीड़ को तितरबितर करें. सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने पाया था कि ऐसी अवैध जगहों पर अक्सर असामाजिक तत्व जमा होते हैं और पुलिस से इस तरह की खतरनाक जगहों पर नजर रखने को कहा था.

कम्युनिटी से जुड़ाव और नागरिकों के साथ बैठकें

महिलाओं और लोगों की सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को सीधे जानने के लिए एक तय अधिकारी की देखरेख में नागरिकों के साथ नियमित बैठकें होनी चाहिए. खासकर उन इलाकों में जहां पेइंगगेस्ट अकोमोडेशन और युवतियों के लिए शिक्षण संस्थान हैं.

प्रिवेंटिव पुलिसिंग में संस्थागत ट्रेनिंग की व्यवस्था हो. इलाके के हिसाब से जिम्मेदारी तय करने के लिए, ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट के जरिए पुलिस की शुरुआती ट्रेनिंग और समयसमय पर होने वाले रिफ्रेशर कोर्स में प्रिवेंटिव पुलिसिंग की ट्रेनिंग को शामिल किया जाना चाहिए.

‘शिष्टाचार स्क्वाड’, उत्पीड़नरोधी योजनाओं की समीक्षा

दिल्ली पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया गया है कि वे पिछले 3 महीनों की शिष्टाचार स्क्वाड के कामकाज की साप्ताहिक रिपोर्ट दें. साथ ही ऑपरेशन निर्भीक और नाजुक योजना की स्थिति रिपोर्ट भी जमा करें.

अपने फैसले में बेंच ने क्रिमिनोलॉजी की ब्रोकन विंडोज थ्योरी का जिक्र किया. इस थ्योरी के अनुसार अगर अव्यवस्था और छोटेमोटे अपराधों पर ध्यान न दिया जाए, तो ऐसा माहौल बन सकता है जो गंभीर अपराधों को बढ़ावा दे. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि नागरिक सुविधाओं की अनदेखी के साफ और नजरअंदाज किए गए संकेत यह बताते हैं कि वहां कोई अथॉरिटी है ही नहीं और यह असामाजिक तत्वों के लिए सुरक्षित जगह बन जाती है.

कोर्ट ने कहा कि टूटी हुई या खराब स्ट्रीट लाइट, काम न करने वाला CCTV कैमरा, बिना निगरानी वाला अंधेरा इलाका या जनता की अनसुनी शिकायत, ये सब अलगअलग देखने पर छोटीमोटी प्रशासनिक या इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी कमियां लग सकती हैं. लेकिन जब ऐसी कमियां लंबे समय तक बनी रहती हैं और उन पर ध्यान नहीं दिया जाता, तो वे मिलकर अनदेखी और कम सतर्कता का संदेश देती हैं.

मुख्य सचिव और पुलिस प्रमुख को भी मिले निर्देश

बेंच ने साफ किया कि प्रिवेंटिव पुलिसिंग को पुलिस की शक्तियों के मनमाने या जरूरत से अधिक इस्तेमाल का बहाना नहीं बनाया जा सकता. पुलिस को कानून और उचित सीमा के दायरे में रहकर ही काम करना चाहिए.

संस्थागत जवाबदेही पक्की करने के लिए, बेंच ने दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव और दिल्ली पुलिस कमिश्नर को आदेश दिया कि वे कोर्ट के निर्देशों के पालन के बारे में जानकारी देने के लिए कोर्ट में जमा किए जाने वाले सभी हलफनामों पर अकेले ही हस्ताक्षर करें. कोर्ट ने यह चेतावनी भी दी कि अगर निर्देशों को पूरी गंभीरता से लागू नहीं किया गया, तो इन अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया जाएगा.

मामले की सुनवाई के दौरान, बेंच ने दिल्ली पुलिस से ज़ुबानी तौर पर कहा था कि वे बदमाशों के मन में असली डर पैदा करें और सख्त कार्रवाई करने में हिचकिचाएं नहीं.