हिमाचल प्रदेश के पेंशनरों और प्रदेश सरकार के बीच लंबे समय से जारी गतिरोध पर बुधवार को ‘सहमति की राह’ निकलती दिखाई दी। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के साथ हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में सरकार ने पेंशनरों की वित्तीय मांगों पर सकारात्मक रुख अपनाते हुए 31 जुलाई 2026 तक बकाया एरियर का 40 प्रतिशत हिस्सा जारी करने का भरोसा दिया है। लगभग दो घंटे तक चली इस सौहार्दपूर्ण चर्चा में जहाँ सरकार ने खाली खजाने के बीच पेंशनरों को आर्थिक राहत देने का खाका पेश किया, वहीं पेंशनर संयुक्त संघर्ष समिति ने भी स्पष्ट कर दिया है कि इन फैसलों को धरातल पर उतारने के लिए 15 अगस्त तक की समयसीमा ही स्वीकार्य होगी। यह बैठक न केवल बकाया राशि, बल्कि चिकित्सा बिलों और एचआरटीसी पेंशनरों की सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से भी एक महत्वपूर्ण पड़ाव मानी जा रही है। पढ़ें विस्तार से..

हिमाचल प्रदेश के सियासी गलियारों में बुधवार को उस समय हलचल तेज हो गई जब मुख्यमंत्री कार्यालय में पेंशनरों की हुंकार ने सरकार को बैकफुट पर धकेल दिया। करीब दो साल से एरियर और मेडिकल बिलों के लिए दर-दर भटक रहे लाखों पेंशनरों के लिए यह दिन एक बड़ी रणनीतिक जीत के रूप में उभरा है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू और 18 पेंशनर संगठनों के बीच हुई दो घंटे की तीखी और तार्किक बहस के बाद, सरकार ने 31 जुलाई 2026 तक 40 फीसदी बकाया भुगतान करने का ‘लिखित’ भरोसा दिया है। लेकिन सवाल वही है—क्या यह खजाना खाली होने का बहाना त्यागकर वास्तव में पेंशनरों की जेब तक पहुँचेगा?

वित्तीय घेराबंदी और 40% का ‘फॉर्मूला’

बैठक का मुख्य केंद्र बिंदु 1 जनवरी 2016 से 31 जनवरी 2022 के बीच सेवानिवृत्त हुए कर्मचारियों का वह बकाया था, जो वर्षों से फाइलों में दबा है। मुख्यमंत्री के साथ हुई इस सीधी भिड़ंत में पेंशनर प्रतिनिधियों ने दो-टूक कहा कि उम्र के इस पड़ाव पर वे किस्तों का अनंत इंतजार नहीं कर सकते। दबाव के बीच सरकार ने बीच का रास्ता निकालते हुए जुलाई अंत तक 40 प्रतिशत राशि के भुगतान की समयसीमा तय की है। शेष राशि के लिए ‘किस्त दर किस्त’ का आश्वासन तो मिला है, लेकिन पेंशनरों के चेहरों पर विश्वास से ज्यादा आशंका की लकीरें साफ दिखीं।

मेडिकल बिल : ‘इलाज के बाद अब भुगतान का इंतजार’

पेंशनरों के लिए सबसे बड़ी मार उनके लंबित चिकित्सा बिलों की है। उम्र की ढलान पर खड़े इन बुजुर्गों ने अपनी गाढ़ी कमाई दवाइयों पर खर्च कर दी, लेकिन सरकार ने उनके रिफंड पर ‘कुंडल’ मार रखा था। इस मोर्चे पर सरकार ने तत्काल दिशा-निर्देश जारी करने की बात कहकर एक फौरी मरहम लगाने की कोशिश की है। वहीं, पुलिस पेंशनरों के लिए ‘कैशलेस इलाज’ और उनके बच्चों के लिए सरकारी नौकरियों में विशेष कोटे की मांग को भारतीय सेना की तर्ज पर उठाने का प्रस्ताव एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है, जिसे अगर अमलीजामा पहनाया गया तो यह सुक्खू सरकार का मास्टरस्ट्रोक साबित होगा।

HRTC और बिजली बोर्ड: उपेक्षा के शिकार ‘अपनों’ की जंग

हिमाचल पथ परिवहन निगम (HRTC) के पेंशनरों की व्यथा किसी से छिपी नहीं है। हर महीने की पहली तारीख को पेंशन मिलना उनके लिए किसी सपने जैसा हो गया है। बैठक में इस ‘सौतेले व्यवहार’ पर तीखी चर्चा हुई। सरकार ने न केवल उनकी पेंशन की नियमितता पर सहमति जताई, बल्कि ₹50, 000 की पहली किस्त तत्काल जारी करने का संकेत देकर उनके गुस्से को शांत करने की कोशिश की है। इसके साथ ही, बिजली बोर्ड में OPS की बहाली का मुद्दा अब केवल एक मांग नहीं, बल्कि सरकार के लिए साख का सवाल बन गया है।

15 अगस्त की ‘डेडलाइन’: आंदोलन की तलवार अभी लटकी है

भले ही बैठक सकारात्मक माहौल में समाप्त हुई हो, लेकिन पेंशनर संयुक्त संघर्ष समिति ने अपनी धार कम नहीं की है। प्रतिनिधिमंडल ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि वे केवल ‘आश्वासनों का झुनझुना’ लेकर घर नहीं बैठने वाले। 15 अगस्त 2026 को ‘अल्टीमेटम’ की अंतिम तारीख घोषित की गई है। यदि स्वतंत्रता दिवस तक यह समझौते धरातल पर नजर नहीं आए, तो हिमाचल प्रदेश एक ऐसे विशाल पेंशनर आंदोलन का गवाह बनेगा जो शिमला की पहाड़ियों को हिला कर रख देगा।

मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के लिए यह समझौता एक बड़ी परीक्षा है। एक तरफ खाली खजाना है और दूसरी तरफ वे ‘बुजुर्ग’ जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी प्रदेश के निर्माण में खपा दी। 31 जुलाई की तारीख यह तय करेगी कि सरकार वास्तव में जनहितैषी है या यह केवल एक और चुनावी पैंतरेबाजी थी।