राजस्थान के बाड़मेर में सात साल की मासूम बच्ची के साथ रेप के मामले में पॉक्सो कोर्ट ने सख्त फैसला सुनाया है. न्यायालय ने दोषी को अंतिम सांस तक जेल में रखने की सजा सुनाई है. साथ ही उस पर 1 लाख 75 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है. कोर्ट ने पीड़िता को 7 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने का भी आदेश दिया है. वहीं, सजा सुनाते हुए जज भी भावुक हो गए. उन्होंने पीड़िता की मां के सामने हाथ जोड़ लिये. करीब तीन महीने चली सुनवाई के बाद आए इस फैसले को बाल अपराधों के खिलाफ कड़ा संदेश माना जा रहा है.

मामला जुलाई 2026 का है. सात साल की बच्ची अपने घर के बाहर खेल रही थी. इसी दौरान पड़ोस में रहने वाला एक युवक उसे बहलाफुसलाकर अपने साथ झाड़ियों की ओर ले गया. वहां उसने बच्ची के साथ दुष्कर्म किया. घटना के बाद बच्ची सदमे में आ गई. हालांकि, उसने हिम्मत जुटाकर परिजनों को अपने साथ हुई घटना के बारे में बताया. इसके बाद बच्ची के पिता ने महिला थाने में आरोपी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई.

15 दिन में पुलिस ने पेश किया चालान

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने तत्काल जांच शुरू की. पुलिस ने घटनास्थल और अन्य साक्ष्यों के आधार पर अनुसंधान आगे बढ़ाया. महज 15 दिनों में जांच पूरी कर न्यायालय में चालान पेश कर दिया गया. इसके बाद पॉक्सो न्यायालय में मामले की सुनवाई शुरू हुई.

करीब तीन महीने तक चली सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने 20 गवाहों के बयान दर्ज करवाए. इसके अलावा 44 दस्तावेज और 18 आर्टिकल साक्ष्य के तौर पर न्यायालय में पेश किए गए. अभियोजन पक्ष की ओर से रखे गए तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर न्यायालय ने आरोपी को दोषी करार दिया. इसके बाद उसे अंतिम सांस तक कारावास की सजा सुनाई गई.

पीड़िता की मां के सामने जज ने जोड़े हाथ

मंगलवार को फैसला सुनाए जाने के दौरान न्यायालय का माहौल भावुक हो गया. न्यायाधीश अजिताभ आचार्य ने पीड़िता की मां के सामने हाथ जोड़कर माफी मांगी. इस दौरान बालिकाओं की सुरक्षा को लेकर न्यायालय की संवेदनशीलता भी सामने आई. कोर्ट ने दोषी पर 1.75 लाख रुपये का जुर्माना लगाने के साथ पीड़िता को 7 लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने का आदेश दिया.

शहर से गांवों तक CCTV लगाने के निर्देश

सजा सुनाने के साथ ही न्यायालय ने बच्चों की सुरक्षा को लेकर जिला प्रशासन और पुलिस को कई अहम निर्देश दिए. कोर्ट ने शहरों के साथ ग्रामीण इलाकों में भी सीसीटीवी कैमरे लगाने, पुलिस गश्त बढ़ाने और स्कूल आनेजाने के समय विशेष निगरानी रखने को कहा.

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बच्चों की सुरक्षा केवल पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के हर व्यक्ति को इसके प्रति सजग रहना होगा. इस फैसले ने बाल अपराधों की रोकथाम के लिए सामाजिक जागरूकता और प्रभावी निगरानी की जरूरत को फिर सामने ला दिया है.