
दुनिया के सबसे विनाशकारी और लंबे खिंचते जा रहे रूस-यूक्रेन युद्ध को रोकने के लिए कई महाशक्तियों ने अपने-अपने दांव आजमाए, लेकिन किसी को कामयाबी नहीं मिली. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी चुनाव जीतने के बाद से ही 24 घंटे में जंग रुकवाने के बड़े-बड़े दावे कर रहे थे, पर उनका जादू भी बेअसर रहा. अब इस जंग के मैदान से एक ऐसा कूटनीतिक मोड़ सामने आया है, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है. जो काम दुनिया के बड़े-बड़े सुपरपॉवर देश नहीं कर सके, उसे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘शांति प्लान’ ने कर दिखाया है.
4 देशों के प्रस्तावों में भारत का प्लान सबसे भारी क्यों?
यूक्रेन ने आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है कि भारत द्वारा पेश किया गया सीजफायर का प्रस्ताव सबसे ज्यादा बैलेंस, असरदार और प्रैक्टिकल है. कीव में पत्रकारों से बात करते हुए यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा ने इस बात पर मुहर लगाई कि भारत का प्लान बाकी सभी देशों के प्रस्तावों से कहीं आगे और तगड़ा है.
यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुलासा किया कि इस समय कीव के पास युद्ध रोकने के लिए चार अलग-अलग देशों के कूटनीतिक प्रस्ताव टेबल पर मौजूद हैं. ये शांति प्रस्ताव भारत, अमेरिका, तुर्की और मिस्र की ओर से आए हैं.
सिबिहा ने खुलकर भारत के प्रस्ताव की तारीफ करते हुए कहा, ‘हमारे पास सीजफायर के 4 विकल्प हैं, लेकिन इनमें से भारत का प्रस्ताव सबसे ज्यादा ठोस है. ये पहला मौका है जब भारत ने इस युद्ध को खत्म कराने में मध्यस्थ की सीधी भूमिका निभाने के संकेत दिए हैं’.
ये बयान इस बात का सबूत है कि आज की ग्लोबल डिप्लोमेसी में पीएम नरेंद्र मोदी का कद कितना बड़ा हो चुका है. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जहां केवल बयानों और दबाव की राजनीति में उलझे रहे, वहीं भारत ने एक ऐसा कूटनीतिक खाका तैयार किया जो मॉस्को और कीव दोनों की प्रायोरिटीज को ध्यान में रखता है.
यूक्रेन की क्या है शर्त? ‘एनर्जी और ब्लैक सी सीजफायर’ का कॉम्बिनेशन
भारत के मास्टर प्लान पर भरोसा जताने के साथ-साथ यूक्रेन ने अपनी रणनीति रखी है. विदेश मंत्री सिबिहा ने कहा है कि यूक्रेन, रूस के साथ शांति वार्ता और युद्धविराम के लिए पूरी तरह तैयार है, बशर्ते सीजफायर 2 मोर्चों पर एक साथ लागू किया जाए.
एनर्जी और ब्लैक सी ट्रूस: यूक्रेन की मांग है कि सीजफायर तभी माना जाएगा जब रूस उसके बिजली स्टेशनों, एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर और बंदरगाहों पर मिसाइल हमले पूरी तरह रोकेगा. इसके साथ ही, काला सागर के समुद्री रास्ते पर जहाजों की आवाजाही को पूरी तरह सुरक्षित करना होगा.
पुतिन-जेलेंस्की की सीधी मुलाकात: यूक्रेनी विदेश मंत्री का मानना है कि संपर्क रेखा पर बिना किसी शर्त के सीजफायर तभी मुमकिन है जब राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन आमने-सामने बैठें. भारत का प्रस्ताव इसी सीधी मुलाकात का रास्ता आसान बना रहा है.
बाकी 3 देशों के प्रस्ताव क्यों पड़े फीके?
डोनाल्ड ट्रंप और अन्य देशों की कूटनीति भारत के मुकाबले कमजोर क्यों साबित हुई, इसे समझने के लिए बाकी तीन प्रस्तावों के स्वरूप को देखना जरूरी है.
तुर्की और मिस्र का लिमिटेड प्लान: तुर्की और मिस्र का साझा प्रस्ताव केवल काला सागर में ‘अनाज और कृषि आपूर्ति’ तक सीमित है. मिस्र में गहराते खाद्य संकट को देखते हुए उनकी प्राथमिकता सिर्फ अनाज वाले जहाजों को सुरक्षित रास्ता दिलाने तक ही रुक गई.
ट्रंप और अमेरिका का अधूरा फ्रेमवर्क: अमेरिकी प्रशासन ने केवल ऊर्जा ठिकानों पर हमलों को रोकने के लिए एक आधा-अधूरा ढांचा पेश किया. हालांकि इस पर डोनाल्ड ट्रंप और जेलेंस्की की बातचीत जरूर हुई, लेकिन इसमें युद्ध के अन्य अहम आयामों जैसे मानवीय संकट और क्षेत्रीय सुरक्षा को नजरअंदाज कर दिया गया.
भारत अकेला ऐसा देश रहा जिसने युद्ध के हर संवेदनशील पहलू को एक साथ पिरोकर एक ‘ऑल-इन-वन’ शांति फॉर्मूला तैयार किया.
पीएम मोदी के मुरीद हुए व्लादिमीर पुतिन
यूक्रेन के इस बयान से कुछ ही समय पहले रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी मॉस्को के ‘वाल्दाई फोरम’ में पीएम नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक समझ का लोहा माना था. पुतिन ने दुनिया भर के एक्सपर्ट्स के सामने कहा था कि पीएम मोदी जब भी उनसे बात करते हैं, तो यूक्रेन संघर्ष को रोकने की बात जरूर उठाते हैं.
पुतिन ने कहा था, ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन गिने-चुने विश्व नेताओं में से हैं, जो रूस के साथ बेहद गहरे और दोस्ताना रिश्ते होने के बावजूद हमेशा शांति का रास्ता तलाशते हैं. उनके पास इस जंग को खत्म करने और दोनों पक्षों को मंजूर होने वाले बहुत ही अहम और बेहतरीन विचार हैं’.
रूस का ये बयान इस बात का सबूत है कि मॉस्को भी पीएम मोदी की मध्यस्थता पर पूरा भरोसा रखता है और उनके सुझावों को गंभीरता से ले रहा है.
वैश्विक कूटनीति में भारत का डंका: ‘ये युद्ध का युग नहीं है’
प्रधानमंत्री मोदी ने युद्ध की शुरुआत में ही समरकंद में पुतिन के सामने ऐतिहासिक बयान दिया था कि ‘आज का युग युद्ध का युग नहीं है’. इसके बाद उन्होंने खुद मॉस्को जाकर पुतिन से और कीव जाकर जेलेंस्की से मुलाकात की. जहां पश्चिमी देश और अमेरिका इस जंग में किसी न किसी का पक्ष लेते हुए दिखे, वहीं भारत ने अपनी निष्पक्ष नीति पर कायम रहते हुए दोनों देशों का भरोसा हासिल किया.
अगर भारत के इस ‘मास्टर प्लान’ के जरिए पुतिन और जेलेंस्की एक टेबल पर बैठकर युद्धविराम समझौते पर दस्तखत करते हैं, तो ये मॉडर्न वर्ल्ड के इतिहास में भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक सफलता होगी. पीएम मोदी का ये कदम न सिर्फ वैश्विक अर्थव्यवस्था को राहत देगा, बल्कि भारत को दुनिया के सबसे बड़े ‘शांतिदूत’ के रूप में स्थापित कर देगा.



