भारत के शहरों में पैदल चलना रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है. कोई ऑफिस जाने के लिए सड़क पार करता है, कोई बस या मेट्रो पकड़ने के लिए फुटपाथ पर चलता है, तो कोई बाजार से घर लौटता है. लेकिन जिस सड़क का इस्तेमाल लोग अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए करते हैं, वही कई बार उनके लिए जानलेवा साबित हो सकती है.

तेज रफ्तार गाड़ियां, फुटपाथों पर अतिक्रमण, सड़क पार करने के लिए सुरक्षित जगहों की कमी और दुर्घटना के बाद वाहन चालक का मौके से भाग जाना पैदल चलने वालों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं. दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता के आंकड़े बताते हैं कि पैदल चलने वालों की सुरक्षा सिर्फ ट्रैफिक नियमों का मामला नहीं है.
दिल्ली का आंकड़ा आया है सामने
हाल ही में दिल्ली में पैदल चलने वालों की मौत का आंकड़ा सामने आया है, जिसने इस समस्या को और गंभीर बताया है. इस समस्या की गंभीरता राष्ट्रीय आंकड़ों से भी समझी जा सकती है. सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, उस साल भारत में 35,221 पैदल यात्रियों की सड़क दुर्घटनाओं में मौत हुई, जो कुल सड़क दुर्घटना मौतों का 20.4 प्रतिशत था. ये आंकड़ा बताता है कि सड़क सुरक्षा की चर्चा करते समय पैदल चलने वालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
2024 में सबसे ज्यादा कहां हुई मौतें?
MoRTH की भारत में सड़क दुर्घटनाएं 2024 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 2024 के दौरान सड़क दुर्घटनाओं में 36,526 पैदल यात्रियों की मौतें दर्ज की गईं. राज्य के हिसाब से आंकड़ों की बात करें, तो तमिलनाडु में सबसे अधिक 4,712 मौतें हुईं, जबकि बिहार में 4,149, महाराष्ट्र में 3,344, पश्चिम बंगाल में 3,241, कर्नाटक में 2,321, उत्तर प्रदेश में 2,131, राजस्थान में 2,042, मध्य प्रदेश में 1,928, गुजरात में 1,747 और आंध्र प्रदेश में 1,739 पैदल यात्रियों की जान गई.
दिल्ली: पैदल चलने वालों के लिए क्यों बढ़ रही है मुश्किल?
दिल्ली में पैदल यात्रियों की मौत के आंकड़े चिंता बढ़ाते हैं. हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल जनवरी 2026 से 15 अक्टूबर 2026 तक दिल्ली में कुल 524 पैदल चलने वालों की मौत हो गई. वहीं, 2025 की बात करें, तो दिल्ली में 649 पैदल यात्रियों की सड़क दुर्घटनाओं में मौत हुई. इनमें 330 मामलों में मौत की वजह दर्ज नहीं थी.
ट्रैफिक पुलिस के अनुसार, रात के समय और तेज रफ्तार वाले मार्गों पर पैदल यात्रियों को विशेष खतरा रहता है. इसके अलावा, साल 2024 में एक्सीडेंट में पैदल चलने वाले 584 लोग मारे गए, जबकि 2023 में ऐसे 622 लोग और 2022 में 629 लोग मारे गए. 2024 में 309, 2023 में 343 और 2022 में 358 पैदल चलने वालों की बिना हिसाब वाली मौतें दर्ज की गईं.
- रिंग रोड और आउटर रिंग रोड: तेज रफ्तार वाहनों और भारी ट्रैफिक के कारण यहां सड़क पार करते समय अतिरिक्त सावधानी जरूरी है.
- ग्रैंड ट्रंक रोड: दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के दुर्घटना संबंधी आकलन में इस मार्ग के कई हिस्से दुर्घटना संभावित स्थानों में शामिल रहे हैं.
- फुटपाथ और सुरक्षित क्रॉसिंग की कमी: जहां फुटपाथ टूटे हों या उन पर अतिक्रमण हो, वहां लोगों को सड़क पर चलना पड़ सकता है, जिससे खतरा बढ़ता है.
बेंगलुरु: पैदल चलने वालों के लिए खतरनाक
NCRB के 2023 के आंकड़ों में बेंगलुरु पैदल यात्रियों की मौत के मामले में देश के 53 प्रमुख शहरों में पहले स्थान पर रहा. शहर में सड़क हादसों में 292 पैदल यात्रियों की मौत और 1,021 लोग घायल हुए. अहमदाबाद में 236 और जयपुर में 201 पैदल यात्रियों की जान गई. कर्नाटक में भी 2023 में 2,386 पैदल यात्रियों की मौत दर्ज की गई. रिपोर्ट के अनुसार, बेंगलुरु में टूटे फुटपाथ, अतिक्रमण, गड्ढे और सुरक्षित क्रॉसिंग की कमी पैदल चलने वालों के लिए खतरा बढ़ाती है.
बेंगलुरु में लगातार दूसरे साल पैदल यात्रियों की मौतों का आंकड़ा सबसे ज्यादा रहा. NCRB के 2022 के आंकड़ों के अनुसार, शहर में सड़क हादसों में 247 पैदल यात्रियों की जान गई. इसके बाद अहमदाबाद में 194 और चेन्नई में 187 मौतें दर्ज की गईं. रिपोर्ट में बेंगलुरु के पैदल रास्तों की खराब स्थिति पर भी सवाल उठाए गए.
मुंबई: हिटएंडरन हादसे बड़ी चिंता
मुंबई में पैदल चलने वालों के लिए सबसे बड़ी चिंताओं में हिटएंडरन दुर्घटनाएं शामिल हैं. हिटएंडरन का मतलब है कि वाहन चालक किसी को टक्कर मारने के बाद मौके से भाग जाए. मुंबई ट्रैफिक पुलिस और ब्लूमबर्ग फिलैंथ्रोपीज की पहल से जुड़ी रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में शहर के सभी जानलेवा सड़क हादसों में 38 प्रतिशत हिटएंडरन के मामले थे. इन हादसों में मरने वालों में 54 प्रतिशत पैदल यात्री थे.
मुंबई में सड़क हादसों में मौतों की संख्या 2015 में 611 थी, जो 2020 के बाद घटकर सालाना 350 से 400 के बीच रही. ट्रैफिक पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में सड़क दुर्घटनाओं में 374 लोगों की मौत हुई, जिनमें 151 पैदल यात्री थे. इनमें 72% पुरुष थे और 60 साल से अधिक उम्र के बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए. 2023 में हुए एक्सीडेंट में दो और तीन पहिया वाहनों पर सवार लोग भी बड़ी संख्या में हादसों का शिकार हुए.
- सायनपनवेल हाईवे का जंक्शन: यहां पैदल यात्रियों और दूसरे सड़क उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा चिंता का विषय रही है.
- घाटकोपरमांखुर्द लिंक रोड: इस मार्ग के आसपास भी जानलेवा दुर्घटनाएं दर्ज की गईं.
- वर्ली सीफेस जंक्शन: रिपोर्ट में इसे भी दुर्घटनाओं और सुरक्षा संबंधी चिंताओं वाले स्थानों में शामिल किया गया है.
चेन्नई: पैदल यात्रियों की मौतों पर चिंता
चेन्नई में भी पैदल यात्रियों की सुरक्षा गंभीर मुद्दा बनी हुई है. द हिंदू की रिपोर्ट में एक अध्ययन के हवाले से बताया गया कि शहर में पैदल यात्रियों की मौत के मामले बढ़ने की चिंता सामने आई थी. राष्ट्रीय स्तर पर भी चेन्नई सड़क दुर्घटनाओं के लिहाज से प्रमुख शहरों में शामिल रहा है. 2023 में शहर में 5,686 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गई थीं.
2022 की तस्वीर क्या दिखाती है?
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 2022 में तमिलनाडु देश में पैदल यात्रियों की मौत के मामले में पहले स्थान पर रहा. राज्य में सड़क हादसों में 4,427 पैदल यात्रियों की जान गई. इसके बाद बिहार में 3,345, पश्चिम बंगाल में 2,938 और महाराष्ट्र में 2,894 मौतें दर्ज की गईं. चेन्नई में 1,031 दुर्घटनाओं में 187 लोगों की मौत हुई, जबकि कोयंबटूर में 81 और मदुरै में 76 लोगों की जान गई. देशभर में 2022 के दौरान पैदल यात्रियों की मौतें 12% बढ़कर 32,825 हो गईं.
व्यस्त सड़कें : भारी ट्रैफिक के बीच सड़क पार करने वालों को जोखिम का सामना करना पड़ता है.
सुरक्षित क्रॉसिंग का महत्व: जहां जेब्रा क्रॉसिंग, पैदल सिग्नल और पर्याप्त समय नहीं मिलता, वहां सड़क पार करना मुश्किल हो सकता है.
सड़क की बनावट: फुटपाथ का लगातार उपलब्ध होना और चौराहों की सही डिजाइन पैदल यात्रियों की सुरक्षा के लिए जरूरी है.
कोलकाता: फुटपाथ और सड़क डिजाइन भी अहम
द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, कोलकाता में पैदल चलना कई बार जोखिम भरा हो जाता है. टूटे और बीच में खत्म हो जाने वाले फुटपाथ, अतिक्रमण, सड़क किनारे खड़ी गाड़ियां और सुरक्षित क्रॉसिंग की कमी लोगों की परेशानी बढ़ाते हैं. 2023 में शहर में सड़क हादसों में 185 लोगों की मौत हुई, जिनमें पैदल यात्री भी शामिल थे.
कोलकाता में 2024 के दौरान सड़क दुर्घटनाओं में 79 पैदल यात्रियों की मौत हुई, जो शहर में सड़क हादसों में मारे गए कुल 191 लोगों का लगभग 41% है. इससे पहले 2023 में 72, 2022 में 78, 2021 में 78 और 2020 में 94 पैदल यात्रियों की मौत दर्ज की गई थी.
- टूटे फुटपाथ: लोगों को मजबूरी में सड़क पर उतरना पड़ सकता है.
- अतिक्रमण: फुटपाथ पर दुकानें या अन्य रुकावटें पैदल चलने की जगह कम कर देती हैं.
- खतरनाक क्रॉसिंग: सड़क पार करने के लिए सुरक्षित व्यवस्था न होने पर दुर्घटना का जोखिम बढ़ता है.
गड्ढों से जुड़ी दुर्घटनाओं में मौत
सरकार के बताए आंकड़ों के मुताबिक, 2020 और 2024 के बीच गड्ढों से जुड़ी दुर्घटनाओं में कुल 9,438 लोगों की जान गई, जो 53% की बढ़ोतरी है. सड़क पर बने गड्ढों से होने वाली मौतों के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य रहा. यहां पांच साल में गड्ढों से जुड़े हादसों में 5,127 लोगों की जान गई. इनमें अकेले 2024 में 1,369 मौतें दर्ज की गईं, जबकि 2023 में 1,320 और 2022 में 1,030 लोगों की मौत हुई थी.
वहीं, मध्य प्रदेश में 2020 से 2024 के बीच गड्ढों के कारण 969 लोगों की मौत हुई, जिनमें 277 मौतें पिछले साल दर्ज की गईं. इसी अवधि में तमिलनाडु में 612 और पंजाब में 414 लोगों की जान गई. मंत्रालय को राज्य पुलिस से मिले आंकड़ों के मुताबिक, अलगअलग राज्यों में स्थिति काफी भिन्न रही. हैरानी की बात यह है कि आंध्र प्रदेश, बिहार और गोवा में इन पांच वर्षों के दौरान गड्ढों से जुड़ी कोई दुर्घटना या मौत दर्ज नहीं की गई.
रुकावटें जो छोटी पैदल दूरी को भी मुश्किल रास्ता बना देती हैं
- कंस्ट्रक्शन का मलबा टूटे हुए स्लैब, खोदे हुए फुटपाथ और अधूरा सड़क का काम
- पार्किंग और कब्ज़ा पार्क की हुई गाड़ियां और दूसरी रुकावटें चलने के लिए बहुत कम जगह छोड़ती हैं
- क्रॉसिंग मिसिंग पैदल चलने वालों को तेज़ ट्रैफिक से निपटना पड़ता है या लंबा चक्कर लगाना पड़ता है
- कोई रैंप या आसानी से पहुंचने लायक किनारे नहीं
- बुज़ुर्ग लोग, व्हीलचेयर इस्तेमाल करने वाले और प्रैम वाले मातापिता को ज़्यादा रुकावटों का सामना करना पड़ता है
- टूटा हुआ या ब्लॉक्ड फुटपाथ इस्तेमाल करने लायक फुटपाथ नहीं है.



