बहुत अरसे बाद आज मेरे कानों में एक शब्द गूंजा, मोची. बचपन में यह शब्द कितना जानापहचाना था. गली के मोड़ पर, किसी पेड़ के नीचे, बाजार के किनारे, एक आदमी अपने छोटेसे संसार के साथ बैठा मिलता था. सामने जूते, चप्पलें, सूई, धागा, कीलें और पॉलिश की डिब्बियां. हम बच्चे कभी टूटी चप्पल लेकर जाते, कभी स्कूल के जूते. वह हमारे पैरों की नाप नहीं पूछता था, लेकिन हमारे जूतों को देखकर समझ जाता था कि उन्हें कहां दर्द है. समय बदला. शहर बड़े हुए. जूतों की दुकानें चमकने लगीं. पुराने जूते ठीक कराने के बजाय नए खरीदने की आदत पड़ गई. और न जाने कब हमारी गलियों से वे लोग गायब होने लगे, जिनके हाथ हमारे कदमों को फिर चलने लायक बनाते थे.

आज अपने घर के पास एक मोहल्ले में भोजराज मोची को देखा, तो लगा जैसे बचपन का कोई भूला हुआ परिचित अचानक सामने आ बैठा हो. भोजराज सड़क के किनारे बैठे थे. सफेद कमीज, हल्के रंग की पतलून, चेहरे पर उम्र की लकीरें और दाढ़ी में उतर आई सफेदी. आसपास जूतेचप्पलें बिखरे थे. कुछ मरम्मत के इंतजार में, कुछ शायद अपने मालिकों के लौटने की प्रतीक्षा में. उनके सामने काम के औजार रखे थे. मैं उनके पास जाकर बैठ गया. सड़क पर आनेजाने वालों की अपनी जल्दी थी. किसी को मालूम भी नहीं होगा कि इस आदमी के पास बैठकर उसकी जिंदगी के बारे में पूछा जाए, तो कितने बरसों का एक संसार खुल सकता है.

‘पहचान किसी पद से नहीं, अपने हाथों के हुनर से है’

मैंने उनसे बातचीत शुरू की. नाम पूछा. बोले, ‘भोजराज. उम्र पूछी तो पता चला कि साठ साल के हो चुके हैं. 60 साल! जिस उम्र में कई लोग अपनी नौकरी से विदा लेकर आराम की योजनाएं बनाते हैं, उस उम्र में भोजराज आज भी अपने औजारों के बीच बैठे हैं. उनके सामने किसी दफ्तर की मेज नहीं, सड़क का किनारा है. और उनकी पहचान किसी पद से नहीं, अपने हाथों के हुनर से है.

तीन दशक से भी ज्यादा समय!

बातोंबातों में पता चला कि उनके मातापिता अब इस दुनिया में नहीं हैं. उनके दो भाई हैं. बड़ा भाई खेती करता है. छोटा भाई जोगिया में रहता है. भोजराज नब्बे के दशक में नोएडा आए थे. तब से यहीं जूते ठीक करने का काम कर रहे हैं. तीन दशक से भी ज्यादा समय! मैंने मन ही मन सोचा, इन वर्षों में नोएडा कितना बदल गया होगा. जहां कभी खाली जमीन रही होगी, वहां इमारतें खड़ी हो गईं. सड़कें बनीं, बाजार खुले, गाड़ियां बढ़ीं और न जाने कितने लोग यहां आकर अपनी किस्मत तलाशते रहे.

पुराने हुनर के साथ टिके रहे भोजराज

इसी बदलते शहर के बीच भोजराज अपने पुराने हुनर के साथ टिके रहे. उनके हाथों ने न जाने कितने जूतों को फिर चलने लायक बनाया होगा. कितने बच्चे स्कूल गए होंगे, कितने मजदूर काम पर पहुंचे होंगे, कितने लोग अपनी मंजिल की ओर बढ़े होंगे. उन कदमों के पीछे भोजराज के हाथों की मेहनत रही होगी, लेकिन शायद ही किसी ने कभी पलटकर उनका नाम पूछा हो. मैं उनके पास बैठा था, लेकिन मन कहीं और चला गया. आजकल दिल्ली और उसके आसपास कितनी बातें हो रही हैं. वोट चोरी के आरोप, राजनीति की बहसें, सरकार के कामकाज पर सवाल, नेताओं के बयान और हर तरफ शोर.

देश की राजनीति में आज कौनसा विवाद?

भोजराज को इन सबकी खास जानकारी नहीं है. उनकी दुनिया उन चर्चाओं से अलग चलती है. मैं सोचने लगा, जिस आदमी को यह नहीं मालूम कि देश की राजनीति में आज कौनसा विवाद चल रहा है, क्या उसके जीवन का राजनीति से कोई संबंध नहीं? महंगाई बढ़े तो उसकी कमाई का क्या होता होगा? सड़क बदले, बाजार हटे या रोजीरोटी की जगह छिन जाए, तो वह किससे अपनी बात कहेगा? जिन फैसलों का असर उसके जीवन पर पड़ सकता है, क्या उन्हें लेने वालों तक कभी उसकी आवाज पहुंचती होगी? मैं उनसे राजनीति पर बहस करने नहीं बैठा था. फिर भी उनके पास बैठकर मुझे राजनीति का एक ऐसा सवाल दिखाई दिया, जो किसी बहस में अक्सर सुनाई नहीं देता.

भोजराज अपने काम में माहिर हैं. उनके लिए जूता केवल चमड़े, धागे और तले से बनी चीज नहीं है. वर्षों का अभ्यास उनकी उंगलियों में उतर आया है. वे जानते हैं कि कहां सिलाई टिकेगी, कहां जोड़ मजबूत करना होगा और किस पुराने जूते में अभी चलने की गुंजाइश बची है. मैं उनके हाथों को देखता रहा. ये हाथ किसी बड़े विद्यालय से प्रमाणपत्र लेकर नहीं निकले, लेकिन इन्होंने वर्षों के अभ्यास से अपना ज्ञान कमाया है.

दुनिया में कितनी तरह की पढ़ाई होती है?

हम पढ़ेलिखे लोग अक्सर ज्ञान को किताबों और डिग्रियों में खोजते हैं. फिर किसी ऐसे आदमी के सामने बैठते हैं, जो बिना किताब खोले अपना काम हमसे कहीं बेहतर जानता है. तब समझ आता है कि दुनिया में कितनी तरह की पढ़ाई होती है. कुछ अक्षरों से सीखी जाती है, कुछ जिंदगी से. लेकिन उनकी कहानी को केवल संघर्ष और मेहनत की मिसाल बना देना भी शायद उनके साथ अन्याय होगा.

क्या याद रखना चाहता है और क्या भूल जाना चाहता है?

भोजराज कोई सीख देने के लिए पैदा नहीं हुए. वह हमारी तरह एक इंसान हैं. उनके अपने सुखदुख होंगे, इच्छाएं होंगी, थकान होगी. मातापिता की याद आती होगी. भाइयों से जुड़ी बातें होंगी. कभी काम अच्छा मिलता होगा, कभी कम. मैं उनके मन की हर बात नहीं जानता और शायद यही बात सबसे जरूरी है. हम अक्सर सड़क किनारे काम करने वाले आदमी को देखते ही उसके बारे में पूरी कहानी अपने मन से बना लेते हैं. उसे गरीब कह देते हैं, मेहनती कह देते हैं, बेचारा कह देते हैं. लेकिन उससे यह नहीं पूछते कि वह खुद अपने जीवन को कैसे देखता है. उसकी कहानी में वह क्या याद रखना चाहता है और क्या भूल जाना चाहता है.

सामान पुराना होता तो उसकी मरम्मत होती

भोजराज के सामने बैठेबैठे मुझे अपना बचपन याद आ गया. तब टूटी चीजें फेंकी नहीं जाती थीं. घर में चप्पल टूटती तो मोची के पास जाती. कपड़ा फटता तो सिल दिया जाता. सामान पुराना होता तो उसकी मरम्मत होती. आज बहुत कुछ बदल गया है. नई चीज खरीदना आसान हुआ है, और यह सुविधा बुरी नहीं. लेकिन इसी बदलाव के साथ कुछ हुनर हमारी नजरों से ओझल होते जा रहे हैं. शायद आने वाली पीढ़ी के कई बच्चों को यह भी मालूम न हो कि सड़क किनारे बैठा मोची कितनी कुशलता से एक पुराने जूते को नया जीवन दे सकता है. मुझे दुख केवल किसी पुराने पेशे के कम दिखाई देने का नहीं हुआ. मुझे यह सोचकर दुख हुआ कि कहीं हम चीजों के साथसाथ उन्हें बनाने और संभालने वाले इंसानों को भी भूलना तो नहीं सीख रहे.

हुनर के सहारे जीवन

कुछ देर बाद मैं वहां से उठ गया. भोजराज वहीं बैठे रहे, अपने काम के बीच. मेरे लिए वह एक मुलाकात थी, उनके लिए रोज की जिंदगी का एक और दिन. मैं घर लौट आया, लेकिन उनकी तस्वीर मन में रह गई. 60 साल का एक आदमी, जो 90 के दशक से नोएडा में अपने हुनर के सहारे जीवन बिता रहा है. न कोई बड़ी घोषणा, न कोई शिकायतों से भरा भाषण. बस एक इंसान, जिसका जीवन उतना ही सच है जितना मेरा या आपका.

आज उनके साथ बैठने का अवसर मिला, तो मन में उनके लिए सम्मान और एक अनकही कृतज्ञता रह गई. शायद किसी आदमी को समझने की शुरुआत उसकी कहानी सुनाने से नहीं, उसके पास बैठकर उसे सुनने से होती है. जिस समाज में हम अपने जूते बनाने वाली कंपनी का नाम याद रखते हैं, लेकिन उन्हें ठीक करके हमें फिर चलने लायक बनाने वाले भोजराज का नाम नहीं जानते, उस समाज में आखिर किसे आगे बढ़ना कहते हैं?