चोटों से जूझती हुई, कई बार शुरुआती दौर में ही हार झेलने वाली और दो बार घुटने की सर्जरी से गुजरने के बाद भी हार न मानने वाली मणिपुर की इनुंगानबी ताखेल्लामबम ने आखिरकार वह कर दिखाया, जिसका भारत को 13 साल से इंतजार था। एशियन जूडो चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर इनुंगानबी ने न सिर्फ अपनी मेहनत को मुकाम तक पहुंचाया, बल्कि एंगोम अनीता चानू के बाद इस स्तर पर पदक जीतने वाली पहली भारतीय बनकर इतिहास भी रच दिया। यह सिर्फ एक पदक नहीं, बल्कि संघर्ष, धैर्य और विश्वास के जीत की कहानी है।

चोट, संघर्ष और फिर मेडल: मणिपुर की बेटी ने जूडो में रचा इतिहास, खत्म किया 13 साल का इंतजार
चोट, संघर्ष और फिर मेडल: मणिपुर की बेटी ने जूडो में रचा इतिहास, खत्म किया 13 साल का इंतजार

ब्लेजर वाला वादा और ऐतिहासिक पल

मंगोलिया की लखवादुलम सरंत्सेत्सेग के खिलाफ कांस्य पदक मुकाबले में जब इनुंगानबी ने चोकहोल्ड लगाकर जीत पक्की की, तब वह सिर्फ मैच पर फोकस कर रही थीं, लेकिन असली मायने उस जीत के बाद सामने आए। उनकी कोच एंगोम अनीता चानू वर्षों से एक ब्लेजर अपने साथ लेकर टूर्नामेंट में जाती थीं, जो सिर्फ पदक मैच में पहना जाता है, लेकिन उन्हें कभी पहनने का मौका नहीं मिला। इस बार इनुंगानबी ने ही उनसे कहा था कि मैम इस बार आप इसे जरूर पहनेंगी और आखिरकार 13 साल बाद वह ब्लेजर मैदान में नजर आया।

इनुंगानबी का सफर आसान नहीं रहा। क्वार्टर फाइनल में उन्हें उज्बेकिस्तान की शिरिनजोन युल्डोशोवा से हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद उनका सफर लगभग खत्म सा लग रहा था। हालांकि, जैसे ही युल्डोशोवा फाइनल में पहुंचीं, इनुंगानबी के लिए रेपेचेज का रास्ता खुल गया। इनुंगानबी ने मिले दूसरे मौके को दोनों हाथों से भुनाया और कांस्य पदक मुकाबले तक पहुंचीं।

इनुंगानबी ने बताया, ‘‘जब मैं कांस्य पदक मुकाबले में उतरी तो खुद से कहा यह बहुत बड़ा मौका है।’’ इनुंगानबी मणिपुर से आती हैं। मणिपुर कुंजुरानी देवी और मैरीकॉम जैसी हस्तियों की जन्मस्थली है। इनुंगानबी ने भी वहां के कई युवा एथलीटों की तरह किसी एक खेल में जमने से पहले कई तरह के खेल आजमाए।

इनुंगानबी ने बताया, ‘‘कुंजुरानी देवी और मैरीकॉम जैसी खिलाड़ियों को देखकर मैंने कई तरह के खेल आजमाए। मैंने फुटबॉल भी खेला, लेकिन मेरा ध्यान जूडो ने खींचा। मुझे चोकहोल्ड या जूडो के किसी भी दूसरे दांवपेंच के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। मैंने सिर्फ कार्टव्हील देखा। मैंने बस उसमें कलाबाजियां खाते हुए देखा और उसे चुन लिया।’’

इनुंगानबी का करियर 2018 में एक गंभीर घुटने की चोट से पटरी से उतर गया। सर्जरी हुई और रिकवरी में करीब एक साल लग गया। इनुंगानबी ने बताया, ‘‘पहली बार जब चोट लगी तो शरीर बिल्कुल कमजोर हो गया था।’’ उसी घुटने में 2024 में फिर चोट लगी, इस बार उनकी वापसी ज्यादा मजबूत और तेज रही।

इनुंगानबी 2021 से सीनियर भारतीय टीम का हिस्सा हैं, लेकिन लंबे समय तक वह पहले राउंड से आगे नहीं बढ़ पाती थीं। यह पदक उनके लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ है। इनुंगानबी ने कहा, ‘‘यह जीत मुझे और आत्मविश्वास देगी।’’ इनुंगानबी का लक्ष्य अब कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स हैं। हालांकि, वह जानती हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार बेहतर प्रदर्शन के लिए अभी और मेहनत की जरूरत है।

इनुंगानबी ने कहा, ‘‘हमारी टीम की दो और खिलाड़ी भी कांस्य पदक तक पहुंचीं, लेकिन मेडल नहीं जीत पाईं। अगर हमें ज्यादा विदेशी एक्सपोजर और ट्रेनिंग कैंप मिलें तो हम और बेहतर कर सकते हैं।’’ कहना गलत नहीं होगा कि इनुंगानबी का यह पदक सिर्फ निजी उपलब्धि नहीं बल्कि भारतीय जूडो के लिए नई उम्मीद भी है और वह ब्लेजर जो वर्षों से सिर्फ बैग में रखा रह जाता था, अब नई शुरुआत और विश्वास का प्रतीक बन चुका है।

चीन के खिलाफ 05 की हार के साथ भारत का उबर कप में सफर खत्म हो गया। पीवी सिंधु की लड़ाई भी टीम को जीत नहीं दिला पाई।