मंडी। हिमाचल प्रदेश में हुनर और प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। यहां कई ऐसे लोग हैं, जो सीमित संसाधनों और मुश्किल हालात के बावजूद अपने हुनर से कुछ ऐसा कर गुजरते हैं कि देखने वाले भी दंग रह जाते हैं। जरूरत है तो बस ऐसे हुनरमंद लोगों को एक मंच और उचित प्रोत्साहन देने की। मंडी जिले में भी एक ऐसा ही शख्स है, जिसकी कहानी किसी मिसाल से कम नहीं है।

 

दिनभर चाय बेचकर अपने परिवार का पालन-पोषण करने वाला यह शख्स जब अपने हुनर को आकार देने बैठता है तो लकड़ी के बेकार टुकड़ों को ऐसी बेमिसाल कलाकृतियों में बदल देता है, जिन्हें देखकर कोई भी उसकी कला का कायल हो जाए। खास बात यह है कि जिस लकड़ी को लोग बेकार समझकर जला देते हैं, उसी से यह कलाकार ऐतिहासिक इमारतों, मंदिरों और धार्मिक स्थलों के हूबहू मॉडल तैयार कर रहा है।

दिन में चाय की दुकान, खाली समय में बनता है कलाकार

मंडी शहर के जेल रोड पर रहने वाले 50 वर्षीय हरजिंदर सिंह की जिंदगी आम लोगों से कुछ अलग है। परिवार की जिम्मेदारियां निभाने के लिए वह वर्षों से चाय की दुकान चला रहे हैं। सुबह से शाम तक दुकान पर लोगों को चाय पिलाने वाले हरजिंदर के हाथों में एक ऐसा हुनर भी है, जिसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है। दुकान के काम से जब भी उन्हें फुर्सत मिलती है, वह लकड़ी के छोटे-बड़े टुकड़े इकट्ठा कर अपनी कल्पनाओं को आकार देने में जुट जाते हैं। धीरे-धीरे यही उनका जुनून बन गया और आज वह बेकार लकड़ी से ऐसी शानदार कलाकृतियां तैयार कर रहे हैं, जिन्हें देखकर उनकी मेहनत और कल्पनाशीलता का अंदाजा लगाया जा सकता है।

 

बचपन का शौक 15 साल पहले बना जुनून

हरजिंदर सिंह के मुताबिक उन्हें बचपन से ही कला और मॉडल बनाने का शौक था, लेकिन पारिवारिक परिस्थितियों के कारण वह इस शौक को उस समय आगे नहीं बढ़ा पाए। जिंदगी की जिम्मेदारियों ने उन्हें अपने हुनर से दूर रखा। करीब 15 वर्ष पहले एक दोस्त के पिता को उपहार में मिला एक मॉडल देखने के बाद उनके मन में उससे भी बेहतर कलाकृति तैयार करने की इच्छा जागी। बस यहीं से उनके अंदर छिपे कलाकार ने फिर से उड़ान भरनी शुरू कर दी। उन्होंने खुद ही मॉडल बनाने का प्रयास शुरू किया और धीरे-धीरे अपनी मेहनत तथा अनुभव से इस कला में निपुणता हासिल कर ली।

 

मंडी के ऐतिहासिक घंटाघर से शुरू हुआ कलाकारी का सफर

हरजिंदर सिंह ने सबसे पहले मंडी शहर के ऐतिहासिक घंटाघर का मॉडल तैयार किया। यह उनके हुनर की पहली बड़ी पहचान बना। इसके बाद उन्होंने केवल घंटाघर का मॉडल बनाकर ही संतोष नहीं किया, बल्कि उसके आसपास की पूरी मार्केट का भी लकड़ी से बारीक मॉडल तैयार कर दिया। उनकी कोशिश रहती है कि जिस इमारत या धार्मिक स्थल का मॉडल बनाया जाए, उसकी असली बनावट और खूबसूरती को छोटे से आकार में भी पूरी तरह उकेरा जा सके।

 

पराशर ऋषि से स्वर्ण मंदिर तक उतारी अद्भुत कलाकृतियां

हरजिंदर के हुनर का दायरा केवल एक शहर या इमारत तक सीमित नहीं है। वह अब तक मंडी के ऐतिहासिक घंटाघर और बाजार के अलावा पराशर ऋषि मंदिर, अमृतसर के स्वर्ण मंदिर और हाल ही में जालपा माता मंदिर सहित करीब आधा दर्जन मॉडल तैयार कर चुके हैं। इन मॉडलों को बनाने में वह लकड़ी के वेस्ट मटेरियल का इस्तेमाल करते हैं। खास बात यह है कि उनके बनाए मॉडल केवल देखने के लिए तैयार किए गए सामान्य ढांचे नहीं होते, बल्कि इनमें असली इमारतों की छोटी-छोटी बनावट और बारीकियों को भी जगह दी जाती है।

एक मॉडल बनाने में लग जाते हैं छह महीने से एक साल

हरजिंदर सिंह के लिए यह काम केवल शौक पूरा करने का जरिया नहीं, बल्कि धैर्य, मेहनत और एकाग्रता की परीक्षा भी है। उनके अनुसार, लकड़ी से एक मॉडल तैयार करने में कम से कम छह महीने से लेकर एक साल तक का समय लग जाता है। वह चाय की दुकान चलाने के साथ जब भी खाली समय मिलता है, अपने मॉडल पर काम करते हैं। कई बार दुकान बंद होने के बाद भी घंटों तक लकड़ी को तराशने और छोटी-छोटी चीजों को आकार देने में जुटे रहते हैं। यही वजह है कि उनके बनाए मॉडल में हर छोटी चीज को खास तरीके से उकेरा जाता है।

 

बेकार लकड़ी को देते हैं बेशकीमती कलाकृति का रूप

आमतौर पर घरों और दुकानों में बची लकड़ी के छोटे टुकड़ों को कबाड़ समझकर फेंक दिया जाता है या फिर जलाने के काम में ले लिया जाता है। लेकिन हरजिंदर की नजर में यही बेकार लकड़ी उनकी कला का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। वह इसी वेस्ट मटेरियल से ऐतिहासिक इमारतों और मंदिरों की प्रतिकृतियां तैयार करते हैं। उनकी कलाकारी यह संदेश भी देती है कि अगर इंसान के पास हुनर और कुछ नया करने का जुनून हो तो बेकार समझी जाने वाली चीजों से भी बेमिसाल कलाकृतियां बनाई जा सकती हैं।

 

हुनर को पहचान दिलाने के लिए मंच और प्रोत्साहन का इंतजार

इतनी शानदार कलाकृतियां तैयार करने के बावजूद हरजिंदर सिंह को मलाल है कि अभी तक उन्हें अपने हुनर को बड़े स्तर पर प्रदर्शित करने का उचित मंच नहीं मिल पाया है। उनका मानना है कि अगर उन्हें सरकार, कला एवं संस्कृति विभाग या किसी अन्य संस्था की ओर से सहयोग और प्रोत्साहन मिले तो वह अपनी कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा सकते हैं। उनके अंदर कुछ नया करने का जज्बा है और वह अपने हुनर के दम पर मंडी और हिमाचल का नाम रोशन करना चाहते हैं।

 

हुनर की पहचान जरूरी, ताकि गुमनाम कलाकारों को मिल सके मुकाम

हरजिंदर सिंह जैसे लोग इस बात का उदाहरण हैं कि प्रतिभा किसी बड़े संस्थान, महंगे संसाधन या सुविधाओं की मोहताज नहीं होती। एक तरफ वह चाय की दुकान चलाकर परिवार की जिम्मेदारियां निभा रहे हैं, तो दूसरी तरफ अपने हुनर से लकड़ी के बेकार टुकड़ों में जान डाल रहे हैं। हिमाचल में ऐसे कई प्रतिभाशाली लोग हैं, जिन्हें केवल एक अवसर और सही मंच की तलाश है। जरूरत है कि ऐसे कलाकारों की प्रतिभा को पहचाना जाए, उन्हें प्रोत्साहित किया जाए और उनकी कलाकृतियों को प्रदर्शित करने के अवसर दिए जाएं। क्योंकि कई बार दुनिया की सबसे खूबसूरत कलाकृतियां महंगे स्टूडियो में नहीं, बल्कि किसी छोटी सी दुकान के कोने में बैठकर मेहनत करने वाले गुमनाम कलाकार के हाथों से जन्म लेती हैं।