IDBI बैंक के प्रस्तावित निजीकरण को लेकर कांग्रेस और केंद्र सरकार के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बैंक कर्मचारियों के समर्थन में उतरते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली NDA सरकार पर निशाना साधा है. राहुल ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के समय बैंक बनाए जाते थे, जबकि बीजेपी के शासन में सरकारी बैंक बेचे जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि सार्वजनिक धन से बने संस्थान जनता के हैं और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को बेचने के लिए संपत्ति नहीं समझना चाहिए.

राहुल गांधी ने शुक्रवार को IDBI बैंक के कर्मचारियों के नाम लिखी अपनी चिट्ठी को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर शेयर किया. उन्होंने लिखा, ‘कांग्रेस के समय में IDBI बना, देश का उद्योग खड़ा करने के लिए… मोदी के समय में पहले बोली देखी गई, फिर दाम तय हुआ… कांग्रेस के समय बैंक बनते थे… मोदी के समय में बिकते हैं… मैं IDBI बैंक के कर्मचारियों के साथ खड़ा हूं.’

कर्मचारियों ने पूछा था मुनाफे में आए बैंक को क्यों बेच रही सरकार?

राहुल गांधी ने अपनी चिट्ठी में बताया कि मार्च 2025 में IDBI बैंक के कर्मचारियों का एक समूह संसद भवन में उनसे मिला था… कर्मचारियों ने सवाल उठाया था कि जिस बैंक को उन्होंने मेहनत करके मुनाफे में पहुंचाया, उसे सरकार क्यों बेच रही है? राहुल के मुताबिक, उन्होंने इस मुद्दे को लोकसभा में उठाया और सरकार से पूछा कि मुनाफा कमा रहे सार्वजनिक बैंक को बेचने की जरूरत क्यों है? बैंक के कर्मचारियों और जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा कैसे होगी?

राहुल ने आरोप लगाया कि सरकार ने इन सवालों का कोई जवाब नहीं दिया. राहुल गांधी ने कहा कि सात साल पहले IDBI बैंक घाटे में था, लेकिन पिछले वित्त वर्ष में बैंक ने 9 हजार करोड़ रुपये से अधिक का मुनाफा कमाया. राहुल ने इस बदलाव का श्रेय बैंक कर्मचारियों की मेहनत को दिया.

कनाडा की कंपनी Fairfax को बेचने का फैसला

IDBI बैंक के निजीकरण की प्रक्रिया को लेकर राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने दावा किया कि सरकार और भारतीय जीवन बीमा निगम यानी LIC की बैंक में कुल हिस्सेदारी करीब 95 प्रतिशत है, जो प्रस्तावित बिक्री के बाद घटकर 34 प्रतिशत रह जाएगी.

दरअसल, 14 अक्टूबर को केंद्र सरकार ने IDBI बैंक की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी कनाडा की Fairfax Financial Holdings की एक कंपनी को बेचने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी. यह सौदा करीब 52,878 करोड़ रुपये का है. इसके तहत केंद्र सरकार अपनी 30.48 प्रतिशत और LIC अपनी 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचेगी. सौदे के बाद केंद्र के पास 15 प्रतिशत और LIC के पास 19 प्रतिशत हिस्सेदारी रह जाएगी.

2003 में संसद को दिए गए आश्वासन का भी उठाया मुद्दा

राहुल गांधी ने IDBI बैंक में सरकारी हिस्सेदारी को लेकर 2003 में संसद में दिए गए आश्वासन का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि उस समय सरकार ने संसद को भरोसा दिया था कि IDBI में उसकी हिस्सेदारी हमेशा कम से कम 51 प्रतिशत रहेगी. राहुल ने अपनी चिट्ठी में लिखा कि यह वादा भले ही कानून में दर्ज न हो, लेकिन संसद से किया गया वादा देश की जनता से किया गया वादा है. उन्होंने सवाल उठाया कि प्रस्तावित बिक्री के बाद सरकार और LIC की संयुक्त हिस्सेदारी 34 प्रतिशत रह जाने से उस आश्वासन का क्या होगा?

निजीकरण से आरक्षण और कर्मचारियों के हित प्रभावित होने का दावा

राहुल गांधी ने IDBI बैंक के निजी हाथों में जाने के बाद अनुसूचित जाति , अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों के लिए आरक्षण व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका जताई है. उन्होंने दावा किया कि निजी स्वामित्व होने के बाद इन वर्गों के लिए आरक्षण का लाभ खत्म हो सकता है. इसके अलावा उन्होंने कर्मचारियों की सेवा शर्तों, पेंशन और अन्य सुविधाओं को लेकर भी चिंता जताई. राहुल ने कहा कि बैंक के निजी स्वामित्व में जाने से कर्मचारियों को मिलने वाला संरक्षण कमजोर पड़ सकता है.

बैंक कर्मचारी पहले से कर रहे हैं निजीकरण का विरोध

IDBI बैंक के कर्मचारी संगठन भी प्रस्तावित बिक्री का विरोध कर रहे हैं. यूनाइटेड फोरम ऑफ IDBI ऑफिसर्स एंड एम्प्लॉइज ने सरकार से सौदे की प्रक्रिया तत्काल रोकने और इसकी संसदीय समीक्षा कराने की मांग की है. कर्मचारी संगठनों ने सौदे के मूल्यांकन की पारदर्शिता और कर्मचारियों के भविष्य को लेकर भी सवाल उठाए हैं. कर्मचारी संगठनों की प्रमुख मांगों में सरकार की हिस्सेदारी कम से कम 51 प्रतिशत बनाए रखना, सेवा शर्तों और पेंशन लाभों को कानूनी संरक्षण देना तथा आरक्षण और कर्मचारी कल्याण से जुड़ी सुविधाओं की रक्षा करना शामिल है.

राहुल बोले कर्मचारियों की जायज मांगों के साथ खड़ा हूं

राहुल गांधी ने IDBI बैंक कर्मचारियों को भरोसा दिलाया कि वह उनकी लड़ाई में साथ हैं. उन्होंने कहा कि कांग्रेस मजबूत सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र, दोनों के साथ काम करने में विश्वास करती है. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक बेचने के लिए संपत्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के साधन हैं. राहुल ने कर्मचारियों से एकजुट और दृढ़ रहने की अपील करते हुए कहा कि वह उनकी सभी जायज मांगों का पूरा समर्थन करते हैं.